श्री चैतन्य भागवत  »  खण्ड 2: मध्य-खण्ड  »  अध्याय 26: शुक्लाम्बर और विजय पर कृपा का वर्णन और भगवान की संन्यास की इच्छा  »  श्लोक 103
 
 
श्लोक  2.26.103 
দেখিলাঙ বসিযা জপেন এই নাম
অহর্নিশি ঽগোপী গোপীঽ না বলযে আন
देखिलाङ वसिया जपेन एइ नाम
अहर्निशि ऽगोपी गोपीऽ ना बलये आन
 
 
अनुवाद
“मैंने देखा कि वे बैठे हुए ‘गोपी, गोपी’ जप रहे थे। दिन-रात वे केवल इन्हीं नामों का जप कर रहे हैं।
 
“I saw him sitting and chanting, ‘Gopi, Gopi.’ Day and night he chanted only these names.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)