श्री चैतन्य भागवत  »  खण्ड 2: मध्य-खण्ड  »  अध्याय 25: श्रीवास के मृत पुत्र के द्वारा आध्यात्मिक ज्ञान का प्रवचन  »  श्लोक 24-33
 
 
श्लोक  2.25.24-33 
এক-দিন নাচে প্রভু শ্রীবাস-মন্দিরে
সুখে শ্রীনিবাস-আদি সঙ্কীর্তন করে
দৈবে ব্যাধি-যোগে গৃহে শ্রীবাস-নন্দন
পরলোক হৈলেন দেখে নারী-গণ
আনন্দে করেন নৃত্য শ্রী-শচী-নন্দন
আচম্বিতে শ্রীবাস-গৃহে উঠিল ক্রন্দন
সত্বরে আইল গৃহে পণ্ডিত শ্রীবাস
দেখে, পুত্র হৈযাছে পরলোক-বাস
পরম গম্ভীর ভক্ত মহা-তত্ত্ব-জ্ঞানীস্
ত্রী-গণেরে প্রবোধিতে লাগিলা আপনি
“তোমরা তো সব জানঽ কৃষ্ণের মহিমা
সম্বর রোদন সবে, চিত্তে দেহঽ ক্ষমা
অন্ত-কালে সকৃত্ শুনিলে যাঙ্র নাম
অতি মহা-পাতকী ও যায কৃষ্ণ-ধাম
হেন প্রভু আপনে সাক্ষাতে করে নৃত্য
গুণ গায যত তাঙ্র ব্রহ্মাদিক ভৃত্য
এ সমযে যাহার হৈল পরলোক
ইহাতে কি যুযায করিতে আর শোক?
কোন কালে এ শিশুর ভাগ্য পাই যবে
ঽকৃতার্থঽ করিযা আপনারে মানি তবে
एक-दिन नाचे प्रभु श्रीवास-मन्दिरे
सुखे श्रीनिवास-आदि सङ्कीर्तन करे
दैवे व्याधि-योगे गृहे श्रीवास-नन्दन
परलोक हैलेन देखे नारी-गण
आनन्दे करेन नृत्य श्री-शची-नन्दन
आचम्बिते श्रीवास-गृहे उठिल क्रन्दन
सत्वरे आइल गृहे पण्डित श्रीवास
देखे, पुत्र हैयाछे परलोक-वास
परम गम्भीर भक्त महा-तत्त्व-ज्ञानीस्
त्री-गणेरे प्रबोधिते लागिला आपनि
“तोमरा तो सब जानऽ कृष्णेर महिमा
सम्वर रोदन सबे, चित्ते देहऽ क्षमा
अन्त-काले सकृत् शुनिले याङ्र नाम
अति महा-पातकी ओ याय कृष्ण-धाम
हेन प्रभु आपने साक्षाते करे नृत्य
गुण गाय यत ताङ्र ब्रह्मादिक भृत्य
ए समये याहार हैल परलोक
इहाते कि युयाय करिते आर शोक?
कोन काले ए शिशुर भाग्य पाइ यबे
ऽकृतार्थऽ करिया आपनारे मानि तबे
 
 
अनुवाद
एक दिन, जब भगवान श्रीवास के घर में नृत्य कर रहे थे, श्रीवास के नेतृत्व में भक्तजन आनंदपूर्वक संकीर्तन में लीन थे। दैवीय कृपा से, देवियों ने श्रीवास के पुत्र को किसी रोग के कारण देह त्यागते देखा। जब श्रीशचिनन्दन आनंद में नृत्य कर रहे थे, श्रीवास के घर में रोने की ध्वनि गूँज उठी। अतः श्रीवास पंडित तुरंत कमरे के अंदर गए और देखा कि उनके पुत्र ने देह त्याग दी है। अत्यन्त शांतचित्त और अध्यात्मशास्त्र के गहन ज्ञान से युक्त श्रीवास देवियों को सांत्वना देने लगे। "आप सभी कृष्ण की महिमा जानते हैं। अपने रोने पर नियंत्रण रखें और अपने मन को शांत करें। जो व्यक्ति मृत्यु के समय एक बार भी कृष्ण का नाम सुन लेता है, वह कृष्ण के धाम को प्राप्त करता है, चाहे वह कितना भी बड़ा पापी क्यों न हो। वे भगवान अब यहाँ साक्षात् नृत्य कर रहे हैं, और ब्रह्मा आदि उनके सेवक उनके गुणों का गुणगान कर रहे हैं। क्या ऐसे समय में शरीर त्यागने वाले व्यक्ति के लिए विलाप करना उचित है? यदि मैं कभी इस बालक के समान सौभाग्यशाली हो सकूँ, तो मैं अपना जीवन सफल मानूँगा।
 
One day, while the Lord was dancing in Srivasa's home, devotees led by Srivasa were joyfully engaged in Sankirtan. By divine grace, the ladies witnessed Srivasa's son passing away due to some illness. While Sri Sachinandana was dancing in joy, the sound of weeping echoed through Srivasa's home. Srivasa Pandita immediately went inside the room and saw that his son had passed away. Extremely calm and possessed of profound knowledge of spiritual science, Srivasa began to console the ladies. "You all know the glories of Krishna. Control your weeping and calm your minds. Anyone who even once hears Krishna's name at the time of death attains Krishna's abode, no matter how great a sinner. The Lord is now dancing here in person, and his servants, including Brahma, are singing his praises. Is it appropriate to lament for a person about to leave his body at such a time? If I could ever be as fortunate as this child, I would consider my life a success."
तात्पर्य
प्रदोष-समये, श्रीवास-अंगने

संगोपने गोरा-मणि

श्री-हरि-कीर्तने, नाचे नाना-रंगे,

उठिला मंगल-ध्वनि

शाम के समय, श्री गौरांग श्रीवास के आंगन में नाना प्रकार से नृत्य कर रहे थे और हरिकीर्तन का मंगलमय स्वर वातावरण में गूंज रहा था।

मृदंग मादल, बाजे करताला

मांझे मांझे जयतुरा

प्रभुरा नटना, देखि सकलरा,

हैला संताप दूरा

कीर्तन के साथ मृदंग, ढोल, करताल और कभी-कभी "जय!" के उद्घोष हो रहे थे। जो-जो प्रभु का नृत्य देखता उसका सारा कष्ट दूर हो जाता।

अखंड प्रेमे, मातल तखना

सकल भकत-गण

आपना पासरि, गोराचंदे घेरि,

नाचे गाए अनुक्षण

भक्त लोग प्रेम की अविरल निर्झर धारा में डूब गए। वे गौराचंद्र के चारों ओर लगातार नाचते और गाते हुए अपने आप को भूल गए।

ए-मता समये, दैव-व्याधि-योगे,

श्रीवासरा अंतः-पुरे

तनय-वियोगे, नारी-गण शोके,

प्रकाशला उच्चैः-स्वरे

उस समय श्रीवास के घर में भाग्यवश एक बीमारी के कारण उनके पुत्र ने देह त्याग दिया और महिलाएं जोर-जोर से शोक करने लगीं।

क्रंदन उठिले, हाबे रस-भंग,

भक्तिविनीद डरे

श्रीवास अमनी, बुझिला कारण

पशिला आपना घरे

भक्तिविनीद को डर था कि अगर रोना-धोना बहुत ज्यादा बढ़ गया तो भगवान के आनंदमय नृत्य में खलल पड़ जाएगा। परिस्थिति को समझते हुए श्रीवास जल्दी से घर के अंदर गए।

प्रवेशिया अंतः-पुरे, नारी-गणे शांत करे,

श्रीवास अमिया उपदेशे

शुन पागलिनि-गण, शोक कर अकारण,

किबा दुःख थाके कृष्णावेशे

घर के अंदर जाने के बाद श्रीवास ने महिलाओं को अपने आध्यात्मिक उपदेशों से सांत्वना दी। सुनो, हे मूढ़ महिलाओं, तुम व्यर्थ में विलाप कर रही हो। कृष्ण के आनंदमय प्रेम की उपस्थिति में दुख कैसे रह सकता है?

कृष्ण नित्य सुत यारा, शोक कभु नाही तारा,

अनित्य आसक्ति सर्व-नाश

असियाचा ए संसारे, कृष्ण भजिबारा तारे

नित्य-तत्त्वे करहा विलाश

जिसने कृष्ण को अपना नित्य पुत्र मान लिया है, वह कभी विलाप नहीं करता। क्षणभंगुर मोह ही मनुष्य के विनाश का कारण बनता है। तुम कृष्ण की उपासना करने के लिए इस भौतिक संसार में आए हो, इसलिए आध्यात्मिक मंच पर आनंदित रहो।

ए देहे यवत स्थिति, कर कृष्णचंद्रे रति,

कृष्ण जाना धन, जन, प्राण

ए देहा-अनुग यता, भाई बंधु पति सुत,

अनित्य संबंध बलि मान

जब तक तुम इस देह में हो, कृष्ण में आसक्त हो जाओ और कृष्ण को ही अपना धन, साथी और जीवन मानो। तुम्हें यह समझना चाहिए कि भाइयों, दोस्तों, पतियों और बच्चों के साथ शारीरिक रिश्ते सभी अस्थायी होते हैं।

केबा का रा पति सुत, अनित्य-संबंध-कृत,

चाहिले राखिते नारे तारे

कर्म-विपाक-फले, सुता है ये वसे कोले,

कर्म-क्षय आर रैते नारे

किसी का पति या पुत्र कौन है? ये तो बस क्षणभंगुर रिश्ते हैं। भले ही कोई भी ऐसे रिश्ते को हमेशा के लिए बनाए रखना चाहे, लेकिन वह ऐसा नहीं कर सकता। अपने कर्मों के फलस्वरूप कोई बेटा बनता है और किसी की गोद में बैठता है। परन्तु जब उसके कर्मों का फल समाप्त हो जाता है, तो वह वहां नहीं रह सकता।

इथे सुख दुःख मानी, अधो-गति लभे प्राणी,

कृष्ण-पदा हйте पड़े दूरे

शोक समवरिया एबे, नामांनंदे माजा सबे,

भक्तिविनीद-वांचा पूरे

ये जीव जो इन रिश्तों में सुख और दुख पाते हैं, वे नीच योनि में चले जाते हैं और कृष्ण के चरणकमलों से बहुत दूर चले जाते हैं। इसलिए अपने विलाप पर नियंत्रण रखो और कृष्ण के नाम जप के आनंद में लीन हो जाओ, तभी भक्ति विनोद की इच्छा पूरी होगी।

धन, जन, देह, गेहा कृष्णे समर्पण

करियाचा शुद्ध-चित्ते करहा स्मरण

पवित्र हृदय से याद रखना कि तुमने अपना धन, साथी, शरीर और घर कृष्ण को समर्पित कर दिया है।

तबे केना "ममा सुत" बलि कर दुःख

कृष्ण नीला निजा-जन ताहे तारा सुख

"हे मेरे पुत्र" कहकर तुम दुख क्यों करती हो? कृष्ण ने अपने प्रिय को अपने आनंद के लिए ले लिया है।

कृष्ण-इच्छा-मते सब घटाया घटा

नाताहे सुख-दुःख-ज्ञान अविद्या-कलपना

सब कुछ कृष्ण की इच्छा से होता है। क्षणभंगुर घटनाओं से अपना सुख-दुख मानना अज्ञानता का प्रतीक है।

याहा इच्छा करे कृष्ण ताई जाना भाला

त्याजिया आपना इच्छा घुचाओ जंजाला

मान लो कि कृष्ण की इच्छा ही श्रेष्ठ है। अपनी स्वार्थी इच्छाओं को त्याग दो और भ्रम से मुक्त हो जाओ।

देया कृष्ण, नेया कृष्ण, पाले कृष्ण सबे

हिंदी पाठः

राखे कृष्ण, मारे कृष्ण, इच्छा करे याबे

कृष्ण देते हैं, कृष्ण लेते हैं, और कृष्ण सभी का भरण करते हैं। कृष्ण रक्षा करते हैं और कृष्ण जब चाहें तब मारते हैं।

कृष्ण-इच्छा विपरीत ये करे वासनातारा

इच्छा नाही फले से पाया यातना

जो कृष्ण की इच्छा के विपरीत इच्छाएँ करता है, उसकी इच्छाएँ कभी पूरी नहीं होंगी। ऐसा व्यक्ति केवल दुख पाता है।

त्याजिया सकल शोक सुन कृष्ण-नाम

परम आनंद पा'बे पूर्ण ह'बे काम

सब विलाप छोड़ो और कृष्ण का नाम सुनो, तो तुम्हें परमानंद का अनुभव होगा और तुम्हारी इच्छाएँ पूरी होंगी।

भक्तिविनोद माँगे श्रीवास-चरणे

आत्म-निवेदन-शक्ति जीवन मरणे

भक्तिविनोद श्रीवास के चरणों में जीवन और मृत्यु में प्रभु को पूर्ण रूप से समर्पित होने की शक्ति के लिए प्रार्थना करते हैं।

सबु मेली' बालक-भाग विचारि'

छोडबि मोह शोक चित्त-विकारी

आप सब इस बच्चे के सौभाग्य पर विचार करें और फिर अपने मोह और विलाप को त्याग दें, जो व्यक्ति के हृदय को अभिभूत कर देता है।

चौद्द-भुवन-पति नंद-कुमार

शची-नंदन भेल नदिया-अवतार

नंद का पुत्र, जो चौदह लोकों का स्वामी है, अब शची के पुत्र के रूप में नादिया में अवतार ले चुका है।

सोहि गोकुल-चांड अंगने मोरा

नाचाइ भक्त-सह आनंद-विभोरा

वही चन्द्रमा जैसा गोकुल का व्यक्तित्व अब मेरे आंगन में अपने भक्तों के साथ समाधि में मग्न होकर नाच रहा है।

सुनता नाम-गान बालक मोरा

छोडल देह हरि-प्रीति-विभोरा

मेरा यह बच्चा पवित्र नामों का उच्चारण सुनते हुए और हरि के प्रेम में लीन होकर अपने शरीर को त्याग गया।

ऐचन भाग यब भाई हामारता

बहुनि हौ भव-सागर-पारा

यदि मैं उसके जैसा भाग्यशाली बन सकता हूँ, तो मैं इस भौतिक सागर को पार कर जाऊंगा।

तुं हु सबु विचरि एहि विचाराकांहे करबि शोक चित्त-विकारा

आप सभी को उसके सौभाग्य की सराहना करनी चाहिए। तुम क्यों विलाप से अपने मन को परेशान करोगे?

स्थिर नाही हौबि यदि उपदेशे

वंचित हौबि रसे अवशेषे

यदि मेरी शिक्षाओं से तुम शांत नहीं होते, तो अंततः तुम कृष्णभावनामृत से वंचित रह जाओगे।

पशिवुनि हामा सुर-तटिनी-माहे

भक्तिविनोद प्रमाद देखे ताहे

तब मैं गंगा के पानी में खुद को डुबो दूँगा। इस संभावना से भक्तिविनोद डरते हैं।

श्रीवास-वचन, श्रवण करिया,

साध्वी पति-व्रत-गण

शोक परिहरि', मृता शिशु राखि',

हरि-रसे दिला मन

श्रीवास के वचन सुनकर, पतिव्रता स्त्रियों ने मृत बच्चे का शोक त्याग दिया और अपना मन हरि नामों के अमृत पर लगाया।

श्रीवास तखन, आनंदे मातिया,

अंगने आइला पुनःनाचे गोरा-सने, सकल पसारी',

गाय नंद-सुता-गुणा

तब श्रीवास आनंद से भरकर आंगन में लौट आए। वे सब कुछ भूल गए, क्योंकि वे गौरंगा के साथ नृत्य कर रहे थे और नंद के पुत्र की महिमा का गान कर रहे थे।

चारि दंड रात्र, मारिल कुमार,

अंगने केहा ना जाने

श्री-नाम-मंगले, तृतीया प्रहर,

रजनी अतीत गाने

हालांकि श्रीवास का पुत्र रात में ही मर गया, लेकिन आंगन में किसी को पता नहीं चला। उन्होंने पूरी रात पवित्र नामों का जाप करते हुए बिताई।

कीर्तन भंगिले, कह गौरहरि,

आजि केना पाई दुःख?

बुझि, एइ गृहे, किछु अमंगल,

घटिया हरिला सुख

जैसे ही कीर्तन समाप्त हुआ, गौरहरि ने पूछा: आज मैं दुखी क्यों महसूस कर रहा हूँ? मुझे लगता है कि इस घर में कोई दुर्भाग्य हुआ है और मेरी खुशी छीन ली है।

तबे भक्त-जन, निवेदन करे,

श्रीवास-शिशुर कथाशुनि गोरा राया, बाले, हाय हाय,

मरेमे पाइन व्यथा

तब भक्तों ने श्रीवास के पुत्र के बारे में प्रभु को खबर दी। उनकी मृत्यु के बारे में सुनकर, भगवान गौरंगा ने कहा: अरे! यह मेरे दिल को पीड़ा देता है।

केना ना कहिले, आमारे तखन,

विपद-संवाद सबे

भक्तिविनोद, भक्त-वत्सल,

स्नेहते मजिला तबे

जब यह आपदा हुई तो तुम में से किसी ने मुझे इसकी सूचना क्यों नहीं दी? भक्तिविनोद कहते हैं कि तब प्रभु अपने भक्तों के लिए स्नेह से भर गए।

प्रभुर वचन, तखन सुनिया,

श्रीवास लोटाना भूमि

बाले, सुनो नाथ! तव रस-भंग,

सहिते ना पारि आमि

प्रभु के वचन सुनकर श्रीवास जमीन पर गिर पड़े और विनम्रतापूर्वक बोले: हे प्रभु, मैं आपका परमानंद भंग होते नहीं देख सकता था।

एकटि तनय, मरियाचे नाथ,

ताहे मोरा किबा दुःख

यदि सब मरे, तोमारे हेरिया,

तबु ता' पाइबा सुख

वह मेरा एकमात्र पुत्र था, हे प्रभु, उसकी मृत्यु पर मुझे क्या दुःख है। यदि सब मर जाएँ, तो भी मैं आपको देखकर आनंदित रहूँगा।

हे प्रभु, मेरे बस एक बेटे की मृत्यु हो गई है। फिर क्यों मैं दुखी हूँ? यदि वे सब मर भी जाएँ, फिर भी मैं आपके दर्शन करके प्रसन्न रहूँगी।

tava nṛtya-bhaṅga, haile āmāra,

maraṇa haitehari

tāi ku-saṁvāda, nā dila tomāre,

विपदा आशाङ्का kari'

यदि आपका नृत्य बिगड़ जाता, तो मैं मर जाती। इस बाधा को रोकने के लिए, मैंने आपको यह बुरी खबर नहीं दी।

ebe ājñā deha, mṛta suta la'ye,

satkāra karuna sabe

eteka śuniyā, gorā dvija-maṇi,

काṅдите lagila tabe

हे प्रभु, अब हमें आदेश दें ताकि हम बच्चे के अंतिम संस्कार कर सकें। यह सुनते ही, गौरांग, ब्राह्मणों के श्रेष्ठ आभूषण, रोने लगे।

kemane e sabe, chāḍiyā yāiba,

paraṇa vikala haya

se kathāśuniyā, bhakativinoda,

manete pāila bhaya

[प्रभु ने कहा:] मैं सबको छोड़कर कैसे जाऊँगा? यदि मैं ऐसा करता हूँ, तो मेरा जीवन बर्बाद हो जाएगा। वे शब्द सुनकर, भक्तिविनोद भयभीत हो गए।

gorācaṅdera ājñā peye gṛha-vāsi-gaṇa

mṛta sute aṅganete āne tata-kṣaṇa

गौरचंद्र का आदेश पाकर, परिवार के सदस्य मृत बच्चे को आंगन में ले आए।

kali-mala-hārī gorā jijñāse takhana

śrīvāse chāḍiyā, śiśu, yāo ki kāraṇa?

गौरांग, जो कलियुग के संदूषण को नष्ट करते हैं, ने बच्चे से पूछा: हे बच्चे, तुम श्रीवास को क्यों छोड़ रहे हो?

mṛta-śiśu-mukhe jīva kare nivedana

loka-śikṣa lāgi prabhu tava ācaraṇa

तब मृत बच्चे के मुँह से आत्मा ने कहा: हे प्रभु, आपके कर्म सभी के निर्देश के लिए हैं।

tumi ta' parama-tattva ananta advaya

parāśakti tomāra abhinna tattva haya

आप असीम परम तत्व हैं। आध्यात्मिक शक्ति आपसे भिन्न नहीं है।

sei parāśakti tridhā haiyā prakāśa

tava icchā-mata karāya tomāra vilāsa

वह आध्यात्मिक शक्ति तीन रूपों में प्रकट होती है और आपकी इच्छा के अनुसार आपके मनोरंजन में सहायता करती है।

cic-chakti-svarūpe nitya-līlā prakāśiyā

tomāre ānanda dena hlādinī haiyā

आपकी आध्यात्मिक शक्ति आपके नित्य लीलाओं को प्रकट करती है, और ह्लादिनी के रूप में, आपको खुशी देती है।

jīva-śakti hañā tava cit-kiraṇa-caye

taṭastha-svabhāve jīva-gaṇe prakaṭaye

आध्यात्मिक शक्ति जीवा शक्ति के रूप में, आध्यात्मिक चिंगारियों की तरह सीमांत रूप से स्थित जीवित संस्थाओं को प्रकट करती है।

māyā-śakti hañā kare prapañca-sṛjana

bahirmukha jīve tāhe karaya bandhana

आध्यात्मिक शक्ति माया शक्ति के रूप में, भौतिक संसार का निर्माण करती है, जिसके भीतर वह भौतिकवादी जीवित संस्थाओं को बांधती है।

bhakativinoda bale aparādha-phale

bahirmukha ha'ye āchi prapañca-kabale

भक्तिविनोद कहते हैं: अपने अपराधों के परिणामस्वरूप मैंने भगवान की सेवा को अस्वीकार कर दिया है और भौतिक जीवन के चंगुल में फंस गया हूँ।

pūrṇa-cid-ānanda tumi, tomāra cit-kaṇa āmi,

svabhāvataḥāmi tuyā dāsa

parama svatantra tumi, tuyā paratantra āmi,

tuyā pada chāḍi' sarva-nāśa

आप पूर्ण आध्यात्मिक आनंद हैं, जबकि मैं एक आध्यात्मिक चिंगारी हूँ। इसलिए मैं स्वभाव से आपका सेवक हूँ। तुम सर्वोच्च रूप से स्वतंत्र हो, जबकि मैं तुम पर पूरी तरह से निर्भर हूँ। आपके चरण-कमलों को छोड़ देने के कारण मैं पतित हो गया हूँ।

svatantra ha'ye yakhana, māyā prati kainu mana,

sva-svabhāva chāḍila āmāya

prapañce māyāra bandhe, paḍinu karmera dhandhe,

karma-cakre āmāre phelāya

जब मैंने स्वतंत्र रूप से माया का आनंद लेने की इच्छा की, तो मैंने अपना संवैधानिक स्वरूप खो दिया। तब मैं भौतिक संसार में माया से बंध गया और कर्मों के जाल में उलझ गया।

māyā tava icchā-mate, bāṅdhe more e jagate,

adṛṣṭa nirbandha lauha-kare

sei ta' nirbandha more, ane śrīvāsera ghare,

putra-rūpe mālinī-jaṭhare

आपकी इच्छा के अनुसार, माया ने मुझे इस संसार में भाग्य की लोहे की जंजीरों से बांध दिया है। उस भाग्य के फलस्वरूप मैंने श्रीवास के घर में मालिनी के गर्भ से पुत्र के रूप में जन्म लिया है।

se nirbandha punarāya, more ebe la'ye yāya,

āmi ta' thākite nāri āra

tava icchā su-prabala, mora icchā su-durbala,

āmi jīva akiñcana chāra

उसी भाग्य से पुनः मैं जा रहा हूँ। मैं अधिक समय तक नहीं रह सकता। आपकी इच्छा बहुत शक्तिशाली है, जबकि मेरी इच्छा बहुत कमजोर है। मैं एक गरीब, तुच्छ जीव हूँ।

yathāya pāṭhāo tumi, avaśya yāiba āmi,

kāra kebā putra pati pitājaḍera sambandha saba,

tāhā nāhi satya-lava,

tumi jīvera nitya pālayitā

जहाँ भी तू भेजें मुझको जाना है। किसका बेटा, पत्नी या पिता कोई है? ये सारे भौतिक रिश्ते हैं जिनमें कोई सच्चाई नहीं है। जीवों के अनादि काल से पालनहार तू है।

संयोग वियोग से हम सुख-दुःख मानते हैं। तेरे चरणों का आश्रय छोड़ देते हैं। माया के गदहे बनकर संसार सागर में डूब जाते हैं। यह सब देखकर भक्तिविनोद को भय लगता है।

जिस दिन से माया ने अज्ञान और मोह की रस्सियों से मुझे बाँध लिया, मैंने बहुत जन्म लिए हैं और माया के वशीभूत होकर भटकता रहा हूँ।

देवता, दानव, मनुष्य, पशु, पक्षी और कीट के रूप में जन्म लिया। स्वर्ग, नरक और पृथ्वी में भ्रमण किया। अस्थायी भौतिक इच्छाओं को पूरा करने के लिए।

मुझे नहीं मालूम कि मैंने कौन सा पुण्य किया था जिसके कारण नादिया में श्रीवास के पुत्र के रूप में जन्म लिया। जिससे मैं तेरे चरण कमलों को देख सकूं और स्पर्श कर सकूं।

मेरी हर मृत्यु के समय मुझे बहुत दुःख सहना पड़ा। लेकिन इस बार तुम्हारे संग में रहने से मैं बड़े सुख से जा रहा हूँ।

हे हरि, मेरी केवल यही प्रार्थना है कि अगर मुझे तुम्हारी इच्छा से फिर से जन्म लेना पड़े तो मुझे तुम्हारे चरणों में प्रेम-भक्ति मिले।

जब वह बच्चा चुप हो गया, भगवान के लीलाओं को देखकर। श्रीवास के परिवार वाले अपना शोक भूल गए और आनंद में डूब गए।

गौर चरित की अमृत धारा, पीते-पीते। भक्तिविनोद, श्रीवास से प्रार्थना करता है, मेरी जान निकल जाए।

भगवान ने श्रीवास से कहा: तुम मेरे सेवक हो। यह सारी दुनिया जानती है कि मैं तुम्हारे प्रेम से बंधा हूँ।

हे श्रीवास पंडित, तुम भक्तों के सेनापति हो। तुम्हारी कीर्ति सारी दुनिया में फैले।

लोगों को ये दिखे कि माया की गुलामी, इस भौतिक जगत की अधिष्ठात्री देवी, तुम्हें कभी नहीं बाँध सकती।

तुमने अपनी धन-दौलत, अनुयायी, शरीर और घर मुझे समर्पित कर दिया है और तुम्हारा एकमात्र सुख मुझे खुशी से सेवा करने में है।

मेरी लीलाओं को समृद्ध करने के लिए तुम्हारा संसार है। सभी गृहस्थ तुम्हारे आचरण से सीखें।

तुम्हारे प्रेम में बंधे हुए हम हैं, नित्यानंद। हम दोनों को अपने बेटे मानकर आनंद लो।

जो हमें अपने नित्य बेटे के रूप में स्वीकार करता है, वह अपने नश्वर बेटे के लिए जन्म या मृत्यु में आसक्त नहीं होता।

तुम्हारी भक्ति में मैं सदा ऋणी हूँ। तुम्हारे साधु स्वभाव से मेरे कर्ज को तुम ही माफ कर सकते हो।

श्रीवास के चरणों में भक्तिविनोद कुजान, विनती करके गौरांग के चरणों की भिक्षा माँगता है।

श्रीवास के प्रसाद, चैतन्य प्रसाद, सब देखकर कहते हैं। जय श्री चैतन्य, जय नित्यानंद, कहकर जोर-जोर से नाचते हैं।

भगवान चैतन्य की श्रीवास पर कृपा देखकर सभी भक्त लगातार नाचते और मंत्रोच्चारण करते रहे: श्री चैतन्य को जय हो! नित्यानंद को जय हो!

श्रीवास के मंदिर में, ऐसी भावनाएँ जागीं,

जिन्हें वर्णित करना मुश्किल है।

भावनाओं का युद्ध और आनंदमय रोना,

पूरे घर को कृष्ण के प्रति दिव्य प्रेम से भर दिया।

चार भाई भगवान के चरणों में गिरे,

और दीनता से प्रार्थना करते हुए, प्रेम में उनकी आवाजें गद्गद हो गईं।

वे रोते हुए, नतमस्तक होकर गिड़गिड़ाते हुए,

प्रेम में ओतप्रोत हो गए।

हे प्राणेश्वर, ऐसी विपत्ति,

हर दिन घटे,

ताकि आपके चरणों में,

हमारी आसक्ति निरंतर बढ़े।

विपत्ति या संपत्ति,

वो दिन शुभ होता है,

जिस दिन हम आपको याद करते हैं।

हे हरि, अगर एक दिन आपके बिना बीत जाता है,

वो दिन अशुभ होता है।

श्रीवास गोष्ठी के चरणों में गिरकर,

भक्तिविनोद प्रार्थना करता है:

गौरंग तुम्हारे हैं। कृपया कृपालु हों और उन्हें इस पतित आत्मा को दिखाएँ।

भक्तवत्सल भगवान ने तब मृत शिशु को उठाया,

और भक्तों के साथ शुभ पवित्र नामों का जाप किया।

जाप करते-करते वे गंगा के तट पर गए,

और बच्चे का अंतिम संस्कार गंगा के जल से किया।

गंगा बोली: मेरा सौभाग्य असीम है।

मेरे पिछले पुण्य कर्म अब सार्थक हुए हैं।

मृत शिशु को गौरंग ने गंगा के जल में डाला,

और गंगादेवी जल से उठीं और बच्चे को अपनी गोद में ले लिया।

गौरंग के कमल चरणों को स्पर्श करके,

देवी प्रेम में भाव विभोर हो गई।

बच्चे को अपनी गोद में लिए हुए,

देवी दिव्य प्रेम से अभिभूत हो गई।

गंगाजी के दिव्य भाव को देखकर,

भक्त लगातार भगवान के शुभ नामों का जाप करते रहे।

स्वर्ग से देवताओं ने फूलों की वर्षा की।

पूरा आकाश उनके विमानों से भर गया।

इस तरह सभी तरह की भावनाओं में लीन होकर,

सभी ने बच्चे का अंतिम संस्कार किया और स्नान किया।

परम आनंद में सभी अपने घरों को लौट गए,

और भक्तिविनोद भगवान गौरंग के दिव्य प्रेम में लीन हो गए।

[श्रोताओं से अपील]

नदिया नगर में गौरंग के चरितामृत का पान करें,

और सभी विलाप और भय को त्यागकर अपने हृदय को स्थिर करें।

हे भाइयों, यह भौतिक संसार क्षणभंगुर है,

और कृष्ण ही एकमात्र सार हैं।

गौरंग की शिक्षाओं के अनुसार हमेशा कृष्ण की भक्ति करें।

गौरंग के चरणों को पकड़ने वाला भाग्यशाली,

वृज में राधा-कृष्ण की भक्ति करता है, वही मेरा प्राण है।

राधा-कृष्ण, गौरचंद्र, नदिया और वृंदावन को अपने जीवन का सार बनाएँ,

और आप शाश्वत धन प्राप्त करेंगे।

विद्या-बुद्धि हीन दीन अकिंचन चार

कर्म-ज्ञान-शून्य आमि शून्य-सदाचार

मैं शिक्षा और बुद्धि से रहित हूँ। मैं गिरा हुआ, दीन, गरीब और तुच्छ हूँ। मैं पवित्र कर्मों, ज्ञान, और उचित व्यवहार से रहित हूँ।

श्री-गुरु वैष्णव मोरे दिलना उपाधि

भक्ति-हीने उपाधि हिला एबे व्याधि

मेरे गुरु और वैष्णवों ने मुझे भक्तिविनोद नाम दिया है, फिर भी क्योंकि मैं भक्ति से रहित हूँ, यह नाम अब एक बीमारी बन गई है।

यतन करिया से व्याधि निवारणे

शरण लिनु आमि वैष्णव-चरणे

इस बीमारी को ठीक करने के लिए, मैंने वैष्णवों के चरण-कमलों की शरण ली है।

वैष्णवरा पद-राज मस्तके धरियाए

'शोक-शातन' गाय भक्तिविनोदिया

वैष्णवों के चरणों की धूल अपने सिर पर लेते हुए, भक्तिविनोद इस शोक-शातन को गाता है, जो विलाप का विध्वंसक है।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)