श्री चैतन्य भागवत  »  खण्ड 2: मध्य-खण्ड  »  अध्याय 24: भगवान का अद्वैत को अपना विश्वरूप का प्रदर्श  »  श्लोक 7
 
 
श्लोक  2.24.7 
কি নগরে, কি চত্বরে, কি বা জলে বনে
নিরন্তর অশ্রু-ধারা বহে শ্রী-নযনে
कि नगरे, कि चत्वरे, कि वा जले वने
निरन्तर अश्रु-धारा वहे श्री-नयने
 
 
अनुवाद
चाहे वे सड़क पर हों, आँगन में हों, पानी में हों या जंगल में हों, उनके कमल जैसे नेत्रों से निरंतर आँसू बहते रहते थे।
 
Whether he was on the road, in the courtyard, in water or in the forest, tears kept flowing continuously from his lotus-like eyes.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)