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श्लोक 2.24.52  |
মহা-অগ্নি যেন জ্বলে সকল বদন
পোডযে পাষণ্ড-পতঙ্গ-দুষ্ট-গণ |
महा-अग्नि येन ज्वले सकल वदन
पोडये पाषण्ड-पतङ्ग-दुष्ट-गण |
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| अनुवाद |
| उस विश्वरूप के मुख से महान अग्नि निकली और उन नास्तिकों तथा दुष्टों को जला डाला, जो पतंगों की तरह उस अग्नि में प्रविष्ट हो गये थे। |
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| A great fire emerged from the mouth of that universal form and burnt those atheists and evil people who had entered that fire like moths. |
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