श्री चैतन्य भागवत  »  खण्ड 2: मध्य-खण्ड  »  अध्याय 24: भगवान का अद्वैत को अपना विश्वरूप का प्रदर्श  »  श्लोक 15
 
 
श्लोक  2.24.15 
ক্ষণে বলে,—“মুঞি সেই মদন-গোপাল”
ক্ষণে বলে,—“মুঞি কৃষ্ণ-দাস সর্ব-কাল”
क्षणे बले,—“मुञि सेइ मदन-गोपाल”
क्षणे बले,—“मुञि कृष्ण-दास सर्व-काल”
 
 
अनुवाद
एक क्षण उन्होंने कहा, "मैं वह मदन-गोपाल हूँ।" दूसरे क्षण उन्होंने कहा, "मैं कृष्ण का शाश्वत सेवक हूँ।"
 
One moment he said, "I am that Madana-Gopala." The next moment he said, "I am the eternal servant of Krishna."
तात्पर्य
श्री गौरसुंदर का प्राकट्य हुआ था यह प्रभाव जगाने के लिए कि जीवों को आध्यात्मिक नामों का जप करने से कैसा पुण्य प्राप्त होता है। जब जीव ब्राह्मी, सांकी और खरोष्ठी भाषाओं जैसे शब्दों से ईश्वर रहित इंद्रिय-तृप्ति के अर्थ निकालकर इंद्रिय तृप्ति पर आधारित अनुभव से पराङमुख होते हैं, तब आध्यात्मिक नामों के प्रभाव से उनकी सनातन प्रवृत्ति जाग्रत हो जाती है। तब वे बाह्य वस्तुओं के प्रति आसक्त होकर संतुष्ट नहीं होते और उनमें एक अवर्णनीय उत्कण्ठा विकसित हो जाती है। उस समय जीवों को अपनी सनातन आध्यात्मिक स्थिति का एहसास होता है। श्री गौरसुंदर ने भी हमेशा परमेश्वर के शाश्वत सेवकों में पाई जाने वाली पांच भावनाओं को स्वयं में प्रकट किया। वे खुद व्रजेंद्रनंदन थे, इसलिए कभी-कभी वे स्वयं को छिपा नहीं पाते थे। वे जीवों की दृष्टि को अवरुद्ध नहीं करते थे, जिससे वे परमेश्वर की पहचान समझ सकते थे और इस प्रकार जान सकते थे कि शची का बेटा नंदा के बेटे से भिन्न नहीं है। वे हमेशा खुद को वैष्णव के रूप में पहचानते थे ताकि सभी जीव, जो भगवान चैतन्य के सेवक हैं, अपनी आध्यात्मिक प्रवृत्तियों को न खोएं और खुद को अहंग्रहोपासक [स्वयं को ईश्वर मानने के विचार से पूजा करने वाला] "मायावादी बाउल" या "मदन-गोपाल" न समझें।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)