श्री चैतन्य भागवत  »  खण्ड 2: मध्य-खण्ड  »  अध्याय 24: भगवान का अद्वैत को अपना विश्वरूप का प्रदर्श  »  श्लोक 100-101
 
 
श्लोक  2.24.100-101 
ঽবিষ্ণুঽ আর ঽবৈষ্ণবঽ সমান দুই হয
পাষণ্ডী নিন্দক ইহা বুঝে বিপর্যয
সকল বৈষ্ণব-প্রতি অভেদ দেখিযাযে
কৃষ্ণ-চরণ ভজে, সে যায তরিযা
ऽविष्णुऽ आर ऽवैष्णवऽ समान दुइ हय
पाषण्डी निन्दक इहा बुझे विपर्यय
सकल वैष्णव-प्रति अभेद देखियाये
कृष्ण-चरण भजे, से याय तरिया
 
 
अनुवाद
विष्णु और वैष्णव समान हैं, किन्तु नास्तिक और ईश-निन्दक ऐसा नहीं सोचते। जो वैष्णवों में भेदभाव किए बिना कृष्ण के चरणकमलों की पूजा करता है, उसका उद्धार होता है।
 
Vishnu and Vaishnava are the same, but atheists and blasphemers do not think so. One who worships the lotus feet of Krishna without discriminating among Vaishnavas is liberated.
तात्पर्य
विष्णु और वैष्णवों के विशिष्ट लक्षण विषय या पूजा की वस्तु, और आश्रय, या उपासक के हैं। इसलिए यदि कोई यह स्वीकार करता है कि विष्णु की स्थिति और वैष्णवों की स्थिति में अंतर है, तो समानता के बजाय भेद किसी के हृदय को पकड़ लेता है। ऐसा भेदभाव प्रमुख रूप से नास्तिकों और ईशनिंदकों में पाया जाता है, क्योंकि यह स्वीकार करके कि विष्णु और वैष्णवों की स्थिति अलग-अलग है, ऐसे लोग उन्हें अपने तर्क के दायरे में लाते हैं। विष्णु की सेवा से रहित झूठा अहंकार उन्हें "स्वामी" के रूप में चित्रित करता है और उन्हें विष्णु और वैष्णवों के बीच भेदभाव करने के लिए प्रेरित करता है। विषय और आश्रय को न समझना निंदनीय और नास्तिक प्रवृत्तियों का निर्माता है। यही कारण है कि यदि कोई यह महसूस करता है कि हर वैष्णव बिना किसी भेदभाव के कृष्ण के चरण कमलों की पूजा करने के दौरान कृष्ण के लीलाओं में प्रवेश करने के लिए योग्य बन जाता है, तो उसकी उपासना परिपक्व हो जाती है। यदि कोई सर्वोच्च भगवान के नाम, रूप और गुणों से सर्वोच्च भगवान के सहयोगियों और विशेषताओं को अलग करता है तो सर्वोच्च भगवान की पूजा करने की कोई संभावना नहीं है। लेकिन अगर कोई यह नहीं पहचानता है कि वैष्णव गुणों के बिना वाला व्यक्ति या विष्णु की भक्ति सेवा से रहित धार्मिक सिद्धांतों का पालन करने वाला व्यक्ति एक गैर-वैष्णव है, लेकिन गलती से उसे वैष्णव मानता है, तो वह भी सर्वोच्च भगवान की पूजा करने में असमर्थ है।

विष्णु की भक्ति सेवा से रहित वैष्णव एक गैर-वैष्णव है। ऊष्मा से रहित वस्तु को "शीत" कहा जाता है। फिर भी भीषण ठंड में भी कुछ गर्मी होती है। इसलिए गर्मी और ठंड के बीच के भेद को न मानना विविधता की अनुपस्थिति का कारण बनता है। लेकिन विविधता या आनंद एक संवैधानिक विशेषता है। प्राकृतिक और अप्राकृतिक अवस्थाओं के बीच असंवैधानिक मंच से बराबरी और भेद करना दोनों ही दोषपूर्ण हैं। जब तक इन दो सांसारिक अवधारणाओं से रहित आध्यात्मिक बोध जाग्रत नहीं हो जाता, तब तक व्यक्ति की शुद्ध सेवा की प्रवृत्ति जाग्रत नहीं होती है। जब तक किसी की सेवा प्रवृत्ति जाग्रत नहीं होती है, कोई न तो सर्वोच्च भगवान को महसूस कर सकता है और न ही भक्ति सेवा में स्थापित हो सकता है।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)