श्री चैतन्य भागवत  »  खण्ड 2: मध्य-खण्ड  »  अध्याय 23: काजी को उद्धार करने वाले दिन नवद्वीप में भगवान का भ्रमण  »  श्लोक 438
 
 
श्लोक  2.23.438 
সবে এক লৌহ-পাত্র আছযে দুযারে
কত ঠাঙি তালি, তাহাহ চোরে ও না হরে
सबे एक लौह-पात्र आछये दुयारे
कत ठाङि तालि, ताहाह चोरे ओ ना हरे
 
 
अनुवाद
श्रीधर के द्वार पर एक लोहे का घड़ा रखा था जिसकी कई बार मरम्मत हो चुकी थी। चोर भी उसे चुरा नहीं सकता था।
 
Sridhar had an iron pot at his door, which had been repaired many times. Even a thief could not steal it.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)