श्री चैतन्य भागवत  »  खण्ड 2: मध्य-खण्ड  »  अध्याय 22: श्री शचीदेवी की अपराध से मुक्ति और नित्यानंद के गुणों का वर्णन  »  श्लोक 90
 
 
श्लोक  2.22.90 
চতুর্-দিকে বিশ্বরূপ পায মনো-দুঃখ
অদ্বৈতের স্থানে সবে পায প্রেম-সুখ
चतुर्-दिके विश्वरूप पाय मनो-दुःख
अद्वैतेर स्थाने सबे पाय प्रेम-सुख
 
 
अनुवाद
विश्वरूप जहाँ भी जाते, दुःखी होते, फिर भी अद्वैत की संगति में उन्हें परमानंद प्रेम का सुख प्राप्त होता।
 
Wherever Vishvarupa went, he would feel sad, yet in the company of Advaita he would find the happiness of ecstatic love.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)