श्री चैतन्य भागवत  »  खण्ड 2: मध्य-खण्ड  »  अध्याय 22: श्री शचीदेवी की अपराध से मुक्ति और नित्यानंद के गुणों का वर्णन  »  श्लोक 85
 
 
श्लोक  2.22.85 
যত অধ্যাপক সব—তর্ক সে বাখানে
কৃষ্ণ-ভক্তি, কৃষ্ণ-পূজাকিছুই না জানে
यत अध्यापक सब—तर्क से वाखाने
कृष्ण-भक्ति, कृष्ण-पूजाकिछुइ ना जाने
 
 
अनुवाद
सभी शिक्षक केवल व्यर्थ के तर्क-वितर्क में लगे रहते थे। उन्हें कृष्ण की पूजा या उनकी भक्ति के बारे में कुछ भी पता नहीं था।
 
All the teachers were engaged in useless arguments and debates. They knew nothing about the worship of Krishna or his devotion.
तात्पर्य
बेकार की सामान्य बहसों का प्रभुत्व स्थापित करने के प्रयास में, विद्वान शिक्षक यह समझने में विफल रहे कि कृष्ण की सेवा और कृष्ण की पूजा सर्वोपरि है।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)