श्री चैतन्य भागवत  »  खण्ड 2: मध्य-खण्ड  »  अध्याय 22: श्री शचीदेवी की अपराध से मुक्ति और नित्यानंद के गुणों का वर्णन  »  श्लोक 84
 
 
श्लोक  2.22.84 
পুত্রাদির মহোত্সবে করে ধন ব্যয
কৃষ্ণ-পূজা, কৃষ্ণ-ধর্ম কেহ না জানয
पुत्रादिर महोत्सवे करे धन व्यय
कृष्ण-पूजा, कृष्ण-धर्म केह ना जानय
 
 
अनुवाद
उन्होंने अपना धन अपने पुत्रों और परिवार के सदस्यों के उत्सवों पर खर्च कर दिया। उन्हें कृष्ण की पूजा या उनकी भक्ति के बारे में कुछ भी पता नहीं था।
 
He spent his wealth on celebrations for his sons and family members. He knew nothing about the worship of Krishna or his devotion to Him.
तात्पर्य
भौतिकवादी लोग कर्मों के फल भोगने को ही सुख मानते हैं और दुख को दूर करना ही धर्म समझते हैं। पिता अपने संग्रहीत धन को अपनी संतानों के सुख के लिए विवाह आदि शुभ कार्यों में ही खर्च करना ही उचित मानते हैं। उनमें से कोई भी नहीं चाहता कि धन भगवान श्रीकृष्ण की भक्ति करने या भक्तिमार्ग के तत्त्वज्ञान को प्राप्त करने में खर्च किया जाए। उस समय तो क्या आज भी कितने ही विचारहीन लोग कर्मों का फल भोग रहे कष्टग्रस्त लोगों की सहायता को भगवान श्रीकृष्ण की भक्ति या भक्तिमार्ग के तत्त्वज्ञान को प्राप्त करने से बड़ा मानते हैं।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)