जैसे ही शचीदेवी ने अद्वैत जी के चरणों की धूल ली, कृष्ण प्रेम के लिए उनका आंदोलन बढ़ने लगा। शचीदेवी भी अपने बाह्य चेतक ज्ञान को खो बैठीं।