श्री चैतन्य भागवत  »  खण्ड 2: मध्य-खण्ड  »  अध्याय 22: श्री शचीदेवी की अपराध से मुक्ति और नित्यानंद के गुणों का वर्णन  »  श्लोक 40
 
 
श्लोक  2.22.40 
যে আইর চরণ-ধূলির আমি পাত্র
সে আইর প্রভাব না জানি তিল-মাত্র
ये आइर चरण-धूलिर आमि पात्र
से आइर प्रभाव ना जानि तिल-मात्र
 
 
अनुवाद
"मैं उस माँ के चरणों की धूल का आकांक्षी हूँ। मैं उसकी महिमा का तनिक भी ज्ञान नहीं रखता।"
 
"I aspire for the dust of the feet of that Mother. I have no knowledge of her glory."
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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