श्री चैतन्य भागवत  »  खण्ड 2: मध्य-खण्ड  »  अध्याय 22: श्री शचीदेवी की अपराध से मुक्ति और नित्यानंद के गुणों का वर्णन  »  श्लोक 33
 
 
श्लोक  2.22.33 
যে-বৈষ্ণব-স্থানে অপরাধ হয যার
পুনঃ সে-ই ক্ষমিলে সে ঘুচে, নহে আর
ये-वैष्णव-स्थाने अपराध हय यार
पुनः से-इ क्षमिले से घुचे, नहे आर
 
 
अनुवाद
“यदि कोई किसी वैष्णव को अपमानित करता है, तो उस अपराध को केवल उस वैष्णव द्वारा ही क्षमा किया जा सकता है, अन्य किसी द्वारा नहीं।
 
“If someone insults a Vaishnava, that offense can be forgiven only by that Vaishnava and not by anyone else.
तात्पर्य
"केवल वैष्णव जो नाराज़ हुए हैं, वो ही अपराधी को क्षमा कर सकते हैं, जैसे दुर्वास ने राजा अम्बरीष को नाराज़ किया था। अगर माता शची आदवैत के चरणों से धूल सर पर लेती हैं, तो आदवैत प्रभु उसका अपराध क्षमा कर देंगे और मैं अपनी माता को प्रभु के प्रति भक्ति सेवा का निर्देश कर पाऊंगा।"
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)