श्री चैतन्य भागवत  »  खण्ड 2: मध्य-खण्ड  »  अध्याय 22: श्री शचीदेवी की अपराध से मुक्ति और नित्यानंद के गुणों का वर्णन  »  श्लोक 16
 
 
श्लोक  2.22.16 
শুতিযা আছিলুঙ্ ক্ষীর-সাগর-ভিতরে
মোর নিদ্রা ভাঙ্গিলেক নাডার হুঙ্কারে
शुतिया आछिलुङ् क्षीर-सागर-भितरे
मोर निद्रा भाङ्गिलेक नाडार हुङ्कारे
 
 
अनुवाद
मैं क्षीरसागर में सो रहा था, किन्तु अद्वैत की तीव्र पुकार से मेरी नींद टूट गयी।
 
I was sleeping in the Kshirsagar, but my sleep was broken by the loud call of Advaita.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)