श्री चैतन्य भागवत  »  खण्ड 2: मध्य-खण्ड  »  अध्याय 22: श्री शचीदेवी की अपराध से मुक्ति और नित्यानंद के गुणों का वर्णन  »  श्लोक 109
 
 
श्लोक  2.22.109 
তথাপিহ আই বৈষ্ণবাপরাধ ভযে
কিছু না বলযে, মনে মহা-দুঃখ পাযে
तथापिह आइ वैष्णवापराध भये
किछु ना बलये, मने महा-दुःख पाये
 
 
अनुवाद
फिर भी किसी वैष्णव को नाराज करने के भय से माता शची ने कुछ नहीं कहा, बल्कि अपने दुःख को अपने भीतर ही रखा।
 
Yet, for fear of angering any Vaishnava, Mother Shachi said nothing, but kept her grief to herself.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)