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श्री चैतन्य भागवत
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खण्ड 2: मध्य-खण्ड
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अध्याय 22: श्री शचीदेवी की अपराध से मुक्ति और नित्यानंद के गुणों का वर्णन
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श्लोक 107
श्लोक
2.22.107
করিঽ দণ্ড গ্রহণ চলিলা বিশ্বরূপ
নিরবধি আইর বিদরে শোকে বুক
करिऽ दण्ड ग्रहण चलिला विश्वरूप
निरवधि आइर विदरे शोके बुक
अनुवाद
विश्वरूप के संन्यास ग्रहण करने और स्वर्ग सिधार जाने के बाद माता शची का हृदय निरंतर शोक से भरा रहता था।
After Vishwarupa took sanyas and went to heaven, Mother Shachi's heart was constantly filled with grief.
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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