यज्ञैः संकीर्तनप्रायैर्यजन्ति हि सुमेधसः
"इस कलियुग में, जो लोग पर्याप्त बुद्धिमान हैं वे प्रभु की आराधना करेंगे, जो अपने सहयोगियों के साथ हैं, संकीर्तन-यज्ञ के प्रदर्शन से।"
इस श्लोक के विचार के अनुसार, श्री गौरसुंदर ने कृष्ण के नाम का वितरण करके पूरे विश्व को गौरवशाली बनाया। उन्होंने श्री ठाकुर हरिदास को पवित्र नामों के जप की प्रक्रिया का प्रचार करने का निर्देश दिया और पता चला कि केवल इस पूजा प्रक्रिया के माध्यम से ही कृष्ण-प्रेम प्राप्त किया जा सकता है।
