श्री चैतन्य भागवत  »  खण्ड 2: मध्य-खण्ड  »  अध्याय 22: श्री शचीदेवी की अपराध से मुक्ति और नित्यानंद के गुणों का वर्णन  »  श्लोक 1
 
 
श्लोक  2.22.1 
জয জয গৌরচন্দ্র কৃপার সাগর
জয শচী-জগন্নাথ-নন্দন সুন্দর
जय जय गौरचन्द्र कृपार सागर
जय शची-जगन्नाथ-नन्दन सुन्दर
 
 
अनुवाद
दया के सागर गौरचन्द्र की जय हो! शची और जगन्नाथ के सुंदर पुत्र की जय हो!
 
Hail Gaurachandra, the ocean of mercy! Hail the beautiful son of Sachi and Jagannatha!
तात्पर्य
कृष्णवर्णं त्विषाकृष्णं सांगोपांगास्त्रपार्षदम्

यज्ञैः संकीर्तनप्रायैर्यजन्ति हि सुमेधसः

"इस कलियुग में, जो लोग पर्याप्त बुद्धिमान हैं वे प्रभु की आराधना करेंगे, जो अपने सहयोगियों के साथ हैं, संकीर्तन-यज्ञ के प्रदर्शन से।"

इस श्लोक के विचार के अनुसार, श्री गौरसुंदर ने कृष्ण के नाम का वितरण करके पूरे विश्व को गौरवशाली बनाया। उन्होंने श्री ठाकुर हरिदास को पवित्र नामों के जप की प्रक्रिया का प्रचार करने का निर्देश दिया और पता चला कि केवल इस पूजा प्रक्रिया के माध्यम से ही कृष्ण-प्रेम प्राप्त किया जा सकता है।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)