श्री चैतन्य भागवत  »  खण्ड 2: मध्य-खण्ड  »  अध्याय 21: भगवान द्वारा देवानंद को प्रताड़ना  »  श्लोक 58
 
 
श्लोक  2.21.58 
ভাগবত অধ্যাপনা করে নিরন্তর
আকুমার সন্ন্যাসীর প্রায ব্রতধর
भागवत अध्यापना करे निरन्तर
आकुमार सन्न्यासीर प्राय व्रतधर
 
 
अनुवाद
वे सदैव श्रीमद्भागवत का उपदेश देते थे। बचपन से ही उन्होंने संन्यासी जीवन जीने का व्रत ले रखा था।
 
He always preached the Srimad Bhagavatam. From childhood, he had vowed to live a life of renunciation.
तात्पर्य
देवानंद ने श्रीमद् भागवतम को पढ़ाया और बचपन से ही संन्यासी की तरह ही एक व्रत ग्रहण करके ब्रह्मचर्य का पालन किया था। परन्तु क्योकि वह भक्ति से रहित थे, उनका ब्रह्मचर्य भक्तों की सेवा के विरुद्ध घृणा में बदल गया। अतः ब्रह्मचर्य का व्रत लेने और त्याग के मार्ग का अनुसरण करने के बावजूद वह ऐसे गुणों का लाभ लेने में असमर्थ रहे।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)