श्री चैतन्य भागवत  »  खण्ड 2: मध्य-खण्ड  »  अध्याय 21: भगवान द्वारा देवानंद को प्रताड़ना  »  श्लोक 50
 
 
श्लोक  2.21.50 
চৈতন্য-চন্দ্রের যশে যার মনে দুঃখ
কোন জন্মে আশ্রমে নাহিক তার সুখ
चैतन्य-चन्द्रेर यशे यार मने दुःख
कोन जन्मे आश्रमे नाहिक तार सुख
 
 
अनुवाद
जो व्यक्ति भगवान चैतन्य की महिमा सुनकर दुःखी होता है, उसे किसी भी जन्म या आश्रम में सुख प्राप्त नहीं होता।
 
One who becomes sad after hearing the glories of Lord Chaitanya does not attain happiness in any birth or ashram.
तात्पर्य
जो महाप्रभु के सभी कार्यो एवं महिमाओं को सुन कर दुःखी होते हैं, वे कभी भी किसी जन्म अथवा आश्रम में सुख प्राप्त नहीं कर पाते।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)