श्री चैतन्य भागवत  »  खण्ड 2: मध्य-खण्ड  »  अध्याय 21: भगवान द्वारा देवानंद को प्रताड़ना  »  श्लोक 14
 
 
श्लोक  2.21.14 
এ বেটার ভাগবতে কোন্ অধিকার?
গ্রন্থ-রূপে ভাগবত কৃষ্ণ-অবতার
ए बेटार भागवते कोन् अधिकार?
ग्रन्थ-रूपे भागवत कृष्ण-अवतार
 
 
अनुवाद
"इस आदमी को श्रीमद्भागवत पर बोलने की क्या योग्यता है? श्रीमद्भागवत भगवान कृष्ण का एक पुस्तक के रूप में अवतार है।
 
“What qualifications does this man have to speak on the Srimad Bhagavatam? The Srimad Bhagavatam is Lord Krishna incarnated in the form of a book.
तात्पर्य
यहाँ बीटा शब्द ऐसे व्यक्ति का वाचक है जिसका ज्ञान नगण्य हो। जिस प्रकार एक बालक को अज्ञता के कारण अपने पिता के सामने मूर्खतापूर्ण कार्य करते हुए देखा जाता है और जिस प्रकार एक पिता या गुरु अज्ञानी जनों को ''मूर्ख'' के नाम से सम्बोधित करते हैं, बीटा शब्द भी ऐसे ही उचित भाव का बोध कराता है । श्रीमद् भागवतम् के तात्पर्य को समझने में असमर्थ वे लोग जो श्रीमद् भागवतम् के शब्दों में निहित विषय वस्तुओं को केवल भौतिक इच्छाओं तक ही सीमित कर लेते हैं, वे कभी भी परम प्रभु से सम्बन्धित विषयों तक नहीं पहुँच सकते। श्रीमद् भागवतम् कृष्ण सम्बन्धी विषयों से भरा हुआ है। जब ये कृष्ण सम्बन्धी विषय हमारे कानों में जाते हैं तो कृष्ण का साक्षात् प्रकटीकरण होता है । तब भौतिक विषयों के रूप में असत्य या कानों के भीतर मैल के समान दो राक्षस मधु और कैटभ नष्ट हो जाते हैं। इसे कर्ण-वेध- संस्कार कहते हैं जो कि कानों को शुद्ध करने की एक प्रक्रिया है। यदि हम अपने आध्यात्मिक कानों पर भौतिक आवरण को स्वीकार कर लें तो भौतिक भोगों से सम्बन्धित शब्द हमारे हृदय को विक्षिप्त कर देते हैं। तब कृष्ण से असम्बन्धित विषय वस्तुएँ हमारे लिए वांछित लक्ष्य बन जाते हैं। परन्तु जब निर्मल, अछुते जीव श्रीमद् भागवतम् को समुचित रूप से सुनते हैं तो आध्यात्मिक नामों का उच्चारण, आध्यात्मिक स्वरूपों का श्रवण, आध्यात्मिक गुणों का श्रवण, आध्यात्मिक सहयोगियों की महिमा का श्रवण और आध्यात्मिक लीलाओं के विषय में श्रवण उनके हृदय में प्रकट होता है। तब वे यह समझ पाते हैं कि उनके हृदय वृन्दावन से सर्वथा भिन्न नहीं हैं। यहाँ पर कृष्णचन्द्र निवास करते हैं।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)