श्री चैतन्य भागवत  »  खण्ड 2: मध्य-खण्ड  »  अध्याय 20: मुरारी गुप्त की महिमा  »  श्लोक 93
 
 
श्लोक  2.20.93 
মুরারির স্কন্ধে দোলে গৌরাঙ্গ-সুন্দর
উল্লাসে ভ্রমযে গুপ্ত বাডীর ভিতর
मुरारिर स्कन्धे दोले गौराङ्ग-सुन्दर
उल्लासे भ्रमये गुप्त बाडीर भितर
 
 
अनुवाद
श्री गौरसुन्दर आनंद में मुरारी की पीठ पर झूल रहे थे, जो पूरे घर में खुशी से घूम रहे थे।
 
Sri Gaurasundara was swinging in bliss on the back of Murari, who was happily roaming around the house.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)