श्री चैतन्य भागवत  »  खण्ड 2: मध्य-खण्ड  »  अध्याय 20: मुरारी गुप्त की महिमा  »  श्लोक 51
 
 
श्लोक  2.20.51 
ঘরে যাহ গুপ্ত, তুমি আমারে কিনিলা
নিত্যানন্দ-তত্ত্ব গুপ্ত তুমি সে জানিলা”
घरे याह गुप्त, तुमि आमारे किनिला
नित्यानन्द-तत्त्व गुप्त तुमि से जानिला”
 
 
अनुवाद
"हे मुरारीगुप्त, अब घर जाओ। तुमने मुझे खरीदा है क्योंकि तुमने नित्यानंद की महिमा को समझ लिया है।"
 
"O Murarigupta, go home now. You have bought me because you have understood the glory of Nityananda."
तात्पर्य
विदा के समय श्री महाप्रभु ने मुरारी से कहा, "तुमने नित्यानंद के गुणों को अच्छी तरह समझा है।" जब भगवान श्री कृष्ण ने देखा कि मुरारी गुप्त को श्री नित्यानंद प्रभु, जो स्वयं भगवान के अवतार हैं, के लिए गहरा प्रेम है, तो भगवान समझ गए कि मुरारी गुप्त हनुमान थे। मुरारी गुप्त की सेवक भाव में आसक्ति के साथ की गई भक्ति को देखकर श्री गौरसुंदर ने रामायण में उनके पात्र को पहचान लिया। इसलिए नित्यानंद के लिए उनके गहरे प्रेम के कारण मुरारी महाप्रभु की कृपा के पात्र बने।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)