श्री चैतन्य भागवत  »  खण्ड 2: मध्य-खण्ड  »  अध्याय 20: मुरारी गुप्त की महिमा  »  श्लोक 38
 
 
श्लोक  2.20.38 
পুণ্য পবিত্রতা পায যে অঙ্গ পরশে
তাহা মিথ্যা বলে বেটা কেমন সাহসে
पुण्य पवित्रता पाय ये अङ्ग परशे
ताहा मिथ्या बले बेटा केमन साहसे
 
 
अनुवाद
“इस रूप के स्पर्श से पुण्यात्मा भी पवित्र हो जाते हैं, फिर वह व्यक्ति यह दावा करने का साहस कैसे कर सकता है कि मेरा शरीर मिथ्या है?
 
“Even the virtuous souls become pure by the touch of this form, then how can that person dare to claim that my body is false?
तात्पर्य
चूँकि मायावादी ये दावा करते हैं कि भौतिक जगत मिथ्या है और इसलिए वे धर्म-निष्ठा, पवित्रता तथा सतोगुण को भी पापमय, अपवित्र और सत्त्व, रज व तम का मिश्रण मानते हैं, इसलिए उनकी कल्पना का प्रवाह परम सत्य का निश्चय करने में असमर्थ है। किन्तु सर्वशक्तिमान परम भगवान ही समस्त अस्तित्व का एकमात्र आधार है। वे लोग जो यह नहीं समझ सकते कि परमेश्वर अपने शरीर और आत्मा के मध्य सदा के लिए भिन्न है, वे इस भौतिक जगत को असत्य मानते हैं और भगवान के शरीर तथा आत्मा में भेद उपस्थित करके सत्य से च्युत हो जाते हैं। केवल वे ही लोग जो अत्यधिक निर्लज हो चुके हैं, उनमें यह दुस्साहस होता है कि भगवान के नित्य, आध्यात्मिक, आनंदमय रूप को मिथ्या कह दें।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)