श्री चैतन्य भागवत  »  खण्ड 2: मध्य-खण्ड  »  अध्याय 20: मुरारी गुप्त की महिमा  »  श्लोक 35
 
 
श्लोक  2.20.35 
অনন্ত ব্রহ্মাণ্ড মোরে যে অঙ্গেতে বৈসে
তাহা মিথ্যা বলে বেটা কেমন সাহসে?
अनन्त ब्रह्माण्ड मोरे ये अङ्गेते वैसे
ताहा मिथ्या बले बेटा केमन साहसे?
 
 
अनुवाद
“मेरे शरीर में असीमित ब्रह्मांड मौजूद हैं, तो वह व्यक्ति यह दावा करने का साहस कैसे कर सकता है कि मेरा शरीर झूठा है?
 
“Infinite universes exist within my body, so how can that person dare to claim that my body is false?
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)