| श्री चैतन्य भागवत » खण्ड 2: मध्य-खण्ड » अध्याय 20: मुरारी गुप्त की महिमा » श्लोक 17 |
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| | | | श्लोक 2.20.17  | স্বপ্নে প্রভু হাসি কহে,—“জানিলা মুরারি
আমি যে কনিষ্ঠ, মনে বুঝহ বিচারি” | स्वप्ने प्रभु हासि कहे,—“जानिला मुरारि
आमि ये कनिष्ठ, मने बुझह विचारि” | | | | | | अनुवाद | | भगवान मुस्कुराए और स्वप्न में उससे बोले, "क्या अब तुम समझ गए, मुरारी? तुम्हें मुझे छोटा समझना चाहिए।" | | | | The Lord smiled and said to him in the dream, "Do you understand now, Murari? You should consider me small." | | ✨ ai-generated | | |
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