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श्री चैतन्य भागवत
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खण्ड 2: मध्य-खण्ड
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अध्याय 20: मुरारी गुप्त की महिमा
»
श्लोक 160
श्लोक
2.20.160
শ্রী-কৃষ্ণ-চৈতন্য-নিত্যানন্দ-চাঙ্দ জান
বৃন্দাবন-দাস তছু পদ-যুগে গান
श्री-कृष्ण-चैतन्य-नित्यानन्द-चाङ्द जान
वृन्दावन-दास तछु पद-युगे गान
अनुवाद
मैं, वृन्दावनदास, श्री कृष्ण चैतन्य और नित्यानन्द प्रभु को अपना जीवन और आत्मा मानकर उनके चरणकमलों की महिमा का गान करता हूँ।
I, Vrindavan Das, consider Sri Krishna Chaitanya and Nityananda Prabhu as my life and soul and sing the glories of their lotus feet.
इस प्रकार श्री चैतन्य-भागवत, मध्य-खण्ड, अध्याय बीस - "मुरारी गुप्त की महिमा" समाप्त होता है ।
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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