श्री चैतन्य भागवत  »  खण्ड 2: मध्य-खण्ड  »  अध्याय 20: मुरारी गुप्त की महिमा  »  श्लोक 144
 
 
श्लोक  2.20.144 
সাধু-নিন্দাশুনিলে সুকৃতি হয ক্ষয
জন্ম জন্ম অধঃপাত—বেদে এই কয
साधु-निन्दाशुनिले सुकृति हय क्षय
जन्म जन्म अधःपात—वेदे एइ कय
 
 
अनुवाद
साधु पुरुषों की निन्दा सुनने से मनुष्य का धर्म नष्ट हो जाता है। वेदों में कहा गया है कि ऐसे लोग जन्म-जन्मान्तर तक नारकीय अवस्था में रहते हैं।
 
Listening to the slander of saints destroys a person's dharma. The Vedas say that such people remain in hell for lifetimes.
तात्पर्य
समझौते के बहाने साधु, गुरु और वैष्णव की निंदा सुनकर भी मौन रह जाते हैं। ऐसे लोग कई जन्मों तक नारकीय योनियों में जाते हैं। उनका सारा सत्कर्म खत्म हो जाता है। श्रीमद्भागवतम (10.74.40) में कहा गया है-

निंदा भगवतः श्रृण्वंस्तत्परस्य जनस्य वा।

ततो नायाति यः सोपि यात्यधाः सुकृतच्च्युतः।।

''जो व्यक्ति भगवान की या उनके परम भक्त की निंदा सुनकर तुरंत वहां से नहीं भाग जाता, वह अवश्य नीचे गिर जाता है और अपने पुण्य कर्मों से वंचित हो जाता है।'' (भक्तिसंदर्भ 265 देखें।)

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)