निंदा भगवतः श्रृण्वंस्तत्परस्य जनस्य वा।
ततो नायाति यः सोपि यात्यधाः सुकृतच्च्युतः।।
''जो व्यक्ति भगवान की या उनके परम भक्त की निंदा सुनकर तुरंत वहां से नहीं भाग जाता, वह अवश्य नीचे गिर जाता है और अपने पुण्य कर्मों से वंचित हो जाता है।'' (भक्तिसंदर्भ 265 देखें।)
