ब्राह्मण सभी चार आश्रमों के लिए योग्य हैं। क्षत्रिय व अन्य लोग वानप्रस्थ तक ही योग्य हैं। संन्यास दो प्रकार का है- नरोंत्तम या प्रथम श्रेणी का मानव जो पूर्ण रूप से सर्वोच्च भगवान श्री कृष्ण पर निर्भर है, तथा धीर, वह जो परिवार से दूर होने पर विचलित नहीं होता है। [अतिरिक्त विवरण के लिए, श्रीमद् भागवतम 1.13.27 और 28 के टीका भाग देखें]। वह संन्यास जो वैदिक नियम के अनुसार स्वीकार किया जाता है, उसे त्रिदंड-संन्यास कहा जाता है। एकदंड-संन्यास में निर्धारित ब्राह्मणिक नियम परमहंस-आश्रम में शिथिल हो जाते हैं, जो नियमों और विनियमों से परे है। शूद्रों के लिए कोई वैदिक संस्कार या शुद्धिकरण संस्कार निर्धारित नहीं है। यदि कोई शूद्र त्यागी का वेश धारण करता है और अपनी इच्छाओं को पूरा करने के लिए इधर-उधर भागता है, तो वह फिर से शूद्र बन जाता है। जो लोग अपनी आजीविका के साधन के रूप में त्रिदंड का उपयोग करते हैं, उन्हें शास्त्रों में भंड या ढोंगी बताया गया है। चूंकि उच्चतम स्तर को प्राप्त करने के बाद भी ऐसे लोग धार्मिक सिद्धांतों के वास्तविक अर्थ को नहीं समझ सकते हैं, इसलिए वे अधर्म को "धर्म" के रूप में प्रचारित करते हैं। चूंकि मायावादी एकदंडी-संन्यासी शूद्रों के मंच पर हैं, इसलिए उन्हें परमहंस-धर्म से धोखा दिया जाता है। यदि ऐसे लोग तब शूद्रों की तरह अपनी भौतिक इच्छाओं की पूर्ति के पीछे दौड़ते हैं, तो वे केवल छद्म त्यागी के रूप में जाने जाते हैं। त्रिदंडी-संन्यासियों का संस्कार पूर्ण होता है। उस व्रत का अनुवर्ती रखरखाव एक अनुकरणीय वैदिक अनुष्ठान के रूप में स्वीकार किया जाता है। शूद्र की तरह इंद्रिय तृप्ति में संलग्न होना, जो संस्कार से रहित है, अधर्म को निमंत्रण देने के अलावा और कुछ नहीं है। भगवान विष्णु के त्रिदंडी-संन्यासी सेवकों में तपस्या, वस्त्र और आजीविका के लिए कोई घमंड नहीं है जो ब्राह्मणों से शुरू होने वाले चार वर्णों और ब्रह्मचारियों से शुरू होने वाले चार आश्रमों में पाए जाते हैं। वे खुद को तथाकथित ब्राह्मण, तथाकथित क्षत्रिय, तथाकथित वैश्य या तथाकथित शूद्र के रूप में नहीं पहचानते हैं। वे चारों वर्णों से श्रेष्ठ हैं। चूँकि उन्होंने सर्वोच्च भगवान की सेवा में ब्रह्मचारी, गृहस्थ, वानप्रस्थ और भिक्षु के चारों आश्रमों में पालन करने के लिए सभी नियमों और विनियमों को शामिल किया है, इसलिए वे इस भोग की दुनिया में तपस्या, वस्त्र और आजीविका अर्जित करने जैसी गतिविधियों में बिल्कुल भी नहीं उलझे हैं। उन्होंने नारद-पंचरात्र छंद का अध्ययन किया है ārādhito yadi hariḥ [ārādhito yadi haris tapasā tataḥ kim, nārādhito yadi haris tapasā tataḥ kim, antar bahir yadi haris tapasā tataḥ kim, nāntar bahir yadi haris tapasā tataḥ kim, "यदि कोई भगवान हरि की पूजा कर रहा है, तो कठोर तपस्या का क्या उपयोग है? और यदि कोई भगवान हरि की पूजा नहीं कर रहा है, तो कठोर तपस्या का क्या उपयोग है? यदि कोई समझ सकता है कि भगवान हरि सर्वव्यापी हैं, तो कठोर तपस्या का क्या उपयोग है? और अगर कोई यह नहीं समझ सकता है कि भगवान हरि सर्वव्यापी हैं, तो कठोर तपस्या का क्या उपयोग है?], इसलिए वे तपस्या के लिए नियमगृह (नियमों और विनियमों का आँख बंद करके पालन) या नियम-अग्रह (नियमों और विनियमों का पालन करने की उपेक्षा) प्रदर्शित करके हरि की पूजा के प्रति घृणा प्रदर्शित नहीं करते हैं। वे बाहरी पोशाक को कोई महत्व नहीं देते हैं। गृहस्थ के रूप में कपड़े पहनने से उनकी प्रतिष्ठा कम नहीं होती है। जब वे संन्यासियों का वेश स्वीकार करते हैं, तो वे गर्व से खुद को उन्नत नहीं मानते हैं। वे अपनी आजीविका के लिए कम से कम प्रयास नहीं करते हैं, जैसा कि ब्राह्मणों के नेतृत्व वाले चारों वर्ण करते हैं। वे जो कुछ भी जमा करते हैं वह विष्णु और वैष्णवों की सेवा के लिए होता है। लेकिन वे केवल अपनी आजीविका के लिए ब्राह्मणों और अन्य लोगों की तरह पेशे नहीं अपनाते हैं। विष्णु का कोई भी सेवक अपने पेट या आनंद की संतुष्टि के लिए दूसरों से दान में कोई भी सामग्री स्वीकार नहीं करेगा, क्योंकि वे जानते हैं कि ब्राह्मण व्यवहार में स्थित हुए बिना दूसरों से दान की स्वीकृति पतन का कारण है। लेकिन पेशेवर त्रिदंड का आश्रय लेते हैं और रावण की तरह कृत्रिम रूप से त्यागियों का वेश धारण करते हैं जबकि वे सभी प्रकार के भौतिक आनंद में लिप्त रहते हैं। वैरागियों की गैर-वैरागियों पर श्रेष्ठता को वैदिक साहित्यों और सांसारिक परंपरा में स्पष्ट रूप से वर्णित किया गया है। लेकिन तपस्या के बहाने वैरागी का वेश धारण करने के बाद इंद्रिय तृप्ति में संलग्न होने से जीव को सर्वोच्च भगवान से विमुख कर देता है। इसलिए, मायावाद के दर्शन का प्रचार करने के क्रम में, धार्मिकता, आर्थिक विकास, इंद्रिय तृप्ति और मुक्ति का उपदेश जो धार्मिक सिद्धांतों से अनभिज्ञ हैं और जो गर्व से खुद को अत्यधिक उन्नत मानते हैं, वह केवल शूद्रों की तरह दान स्वीकार करने की प्यास है और उन लोगों को धोखा देना है जो वैरागियों के रूप में वस्त्र पहनकर अपनी आजीविका चलाते हैं। यह शूद्रों का व्यवहार है और ऐसा व्यवहार कलियुग में लोगों की विशेषता है। गौरसुंदर के अधीनता का त्याग करने और चोरों की तरह कार्य करने के बाद, ऐसे लोग गौर के शुद्ध भक्तों पर हमला करते हैं और नरक में जाते हैं। चोर वास्तव में ऐसे मायावादी-संन्यासी शूद्रों से श्रेष्ठ होते हैं, जो वैरागी के रूप में कपड़े पहनकर अपनी आजीविका कमाने के दौरान अपने "धार्मिक प्रचारकों" होने का पाखंडी दावा करते हैं, जबकि कलियुग के सिद्धांत का आश्रय लेते हैं, और खुद को शूद्रों से श्रेष्ठ मानते हैं, बस काली का जंगली नृत्य है। इसलिए श्रीमद्भागवत के अंतिम छंद में इस घृणित व्यवहार का वर्णन किया गया है। यह छंद वर्ण-धर्म के तथाकथित उन घमंडी अनुयायियों के लिए प्रकट हुआ है, जो श्रीमद्भागवत, सातवें कैंटो, अध्याय तेरह, श्लोक 32 में उल्लिखित सिद्धांत का उल्लंघन करके भ्रमित हो जाते हैं [हम मानते हैं कि यह शायद एक प्रिंटिंग गलती है, क्योंकि यह श्लोक संदर्भ में फिट नहीं होता है। हमारी राय में जिस श्लोक का उल्लेख किया जा रहा है वह श्रीमद्भागवत, सातवां कैंटो, अध्याय ग्यारह, श्लोक 32 है]।
