श्री चैतन्य भागवत  »  खण्ड 2: मध्य-खण्ड  »  अध्याय 20: मुरारी गुप्त की महिमा  »  श्लोक 132
 
 
श्लोक  2.20.132 
এঽ সব দেবতাচৈতন্যের ভিন্ন নহে
ইঙ্হারা ঽঅভিন্ন-কৃষ্ণঽ—বেদে এই কহে
एऽ सब देवताचैतन्येर भिन्न नहे
इङ्हारा ऽअभिन्न-कृष्णऽ—वेदे एइ कहे
 
 
अनुवाद
ये देवता भगवान चैतन्य से पृथक नहीं हैं। वेदों में कहा गया है कि वे कृष्ण से अभिन्न हैं।
 
These deities are not separate from Lord Chaitanya. The Vedas state that they are identical with Krishna.
तात्पर्य
वेदांत दर्शन जो विभिन्न वैदिक उपदेशों में सामंजस्य बैठाता है, यह समझाता है कि देवता भगवान चैतन्य से अलग नहीं हैं। अचिंत्य-भेदाभेद दर्शन वेदांत का उद्देश्य है। चूंकि सभी देवताओं का एक ही उद्देश्य है, जो भगवान श्री चैतन्यदेव की सेवा है, इसलिए वे अलग नहीं हैं। यह मानना कि "भगवान के कोई देवता सेवक नहीं हैं" भेद (देवताओं और भगवान के बीच भेद) को दर्शाता है। चूंकि देवताओं का कोई काम श्री चैतन्य की सेवा के अलावा कोई नहीं हैं, इसलिए वे सभी एक साथ भगवान श्री चैतन्यदेव से एक और भिन्न हैं। जब कभी भगवान की सेवा करने वाले यह सोचते हैं कि देवता भगवान श्री चैतन्य के लीलाओं के प्रतिकूल हैं, तो वे सत्य को जानने में अवश्य कठिनाई और वेदांत के गैर भेद के संकल्प में मतभेद रखते हैं।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)