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श्री चैतन्य भागवत
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खण्ड 2: मध्य-खण्ड
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अध्याय 20: मुरारी गुप्त की महिमा
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श्लोक 11
श्लोक
2.20.11
মুরারি বলযে,—“প্রভু জানিব কে-মতে?
মোর চিত্ত তুমি লৈযাছ যেন-মতে”
मुरारि बलये,—“प्रभु जानिब के-मते?
मोर चित्त तुमि लैयाछ येन-मते”
अनुवाद
मुरारी ने कहा, "हे प्रभु, मैं कैसे जानूँगा? आपने ही मुझे ऐसा करने के लिए प्रेरित किया है।"
Murari said, "O Lord, how would I know? You are the one who inspired me to do this."
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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