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श्री चैतन्य भागवत
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खण्ड 2: मध्य-खण्ड
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अध्याय 19: अद्वैत आचार्य के घर में भगवान की लीलाएँ
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श्लोक 88
श्लोक
2.19.88
দেশান্তর ফিরিঽ নিত্যানন্দ সব জনে
ঽমদ্যপ সন্ন্যাসীঽ হেন জানিলেন মনে
देशान्तर फिरिऽ नित्यानन्द सब जने
ऽमद्यप सन्न्यासीऽ हेन जानिलेन मने
अनुवाद
चूँकि नित्यानंद विभिन्न स्थानों पर गए थे, वे समझ गए कि यह व्यक्ति एक शराबी संन्यासी था।
Since Nityananda had visited various places, he understood that this man was a drunkard sannyasi.
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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