श्री चैतन्य भागवत  »  खण्ड 2: मध्य-खण्ड  »  अध्याय 19: अद्वैत आचार्य के घर में भगवान की लीलाएँ  »  श्लोक 80
 
 
श्लोक  2.19.80 
আপনার শ্লাঘাশুনিঽ সন্ন্যাসী সন্তোষে
ভিক্ষা করিবারে ঝাট বলযে হরিষে
आपनार श्लाघाशुनिऽ सन्न्यासी सन्तोषे
भिक्षा करिबारे झाट बलये हरिषे
 
 
अनुवाद
जब संन्यासी ने अपनी प्रशंसा सुनी तो वह प्रसन्न हो गया और तुरन्त उन्हें भोजन के लिए आमंत्रित किया।
 
When the monk heard his praise, he became happy and immediately invited them for food.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)