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श्री चैतन्य भागवत
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खण्ड 2: मध्य-खण्ड
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अध्याय 19: अद्वैत आचार्य के घर में भगवान की लीलाएँ
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श्लोक 257
श्लोक
2.19.257
হেন মতে মহাপ্রভু অদ্বৈত-মন্দিরে
স্বানুভাবানন্দে কৃষ্ণ-কীর্তনে বিহরে
हेन मते महाप्रभु अद्वैत-मन्दिरे
स्वानुभावानन्दे कृष्ण-कीर्तने विहरे
अनुवाद
इस प्रकार महाप्रभु अद्वैत के घर में कृष्ण की महिमा का आनंद लेते हुए अपनी परमानंद मनोदशा में लीन थे।
Thus Mahaprabhu was absorbed in His ecstatic state of mind, enjoying the glories of Krishna in the abode of Advaita.
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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