श्री अद्वैत प्रभु ने बंगाल के गृहस्थ ब्राह्मण के मनोरंजन को अधिनियमित किया। इसलिए, चूँकि नित्यानंद ने पश्चिम बंगाल के यवनों के साथ जुड़ाव किया था, अद्वैत प्रभु ने उन पर उनके जुड़ाव से उनकी जाति और धार्मिक सिद्धांतों से भटकने का आरोप लगाया। वास्तव में नित्यानंद मदिरा पीने वाले तांत्रिक संन्यासी नहीं थे। इन घटनाओं से, धूर्त लोग भूल से नित्यानंद को स्वयं की तरह ही अनुशासनहीन मानते हैं। परन्तु नित्यानंद प्रभु ने कभी भी ऐसी पापी गतिविधियों को प्रोत्साहित करने वाली कोई शिक्षा नहीं दी है। इस संबंध में, पद्यवली से निम्नलिखित पद्य पर चर्चा करनी चाहिए:
परिवदतु जनो यथा तथा वा
ननु मुखरों न वयं विचारयामः
हरि-रस-मदिरा-मदात-मत्ता
भुवि विलुठामा नटामा निर्विशाम
"चर्चा करने वाले लोग जो कुछ भी कहें, कहें; हम उनकी परवाह नहीं करेंगे। कृष्ण के लिए प्रेम के नशीले पेय के आनंद से पूरी तरह से पागल होकर, हम जीवन का आनंद लेंगे, इधर-उधर भागेंगे, जमीन पर लोटेंगे और आनंद में नाचेंगे।"
