श्री चैतन्य भागवत  »  खण्ड 2: मध्य-खण्ड  »  अध्याय 19: अद्वैत आचार्य के घर में भगवान की लीलाएँ  »  श्लोक 245
 
 
श्लोक  2.19.245 
“জাতি নাশ করিলেক এই নিত্যানন্দ
কোথা হৈতে আসিঽ হৈল মদ্যপের সঙ্গ
“जाति नाश करिलेक एइ नित्यानन्द
कोथा हैते आसिऽ हैल मद्यपेर सङ्ग
 
 
अनुवाद
"इस नित्यानंद ने मेरी जाति को बिगाड़ दिया है। मैं नहीं जानता कि यह शराबी कहाँ से आया है।
 
"This Nityananda has ruined my caste. I don't know where this drunkard came from.
तात्पर्य
शराबी और पागल लोग शुद्ध और दूषित या स्वीकार्य और अस्वीकार्य खाद्य पदार्थों में भेद नहीं करते हैं। जब बाल्यावस्था की बेचैनी से बाहर निकलकर, नित्यानंद ने भोजन कक्ष में चारों ओर चावल फेंका, श्री अद्वैत प्रभु ने यह माना कि इस तरह के कार्य उचित आचरण के नियमों के विपरीत हैं और श्री नित्यानंद पर जाति या छुआछूत का विचार न रखने का आरोप लगाना शुरू कर दिया। "कोई नहीं जानता कि श्री नित्यानंद किस गाँव के हैं, उनके पिता कौन हैं या उनके गुरु कौन हैं। चूँकि उन्होंने कई स्थानों की यात्रा की है, इसलिए उन्होंने विभिन्न वर्ग के लोगों के साथ खाया है। इसलिए, ऐसा स्वाभाविक रूप से नशे में धुत व्यक्ति हमारा पतन कर रहा है."

श्री अद्वैत प्रभु ने बंगाल के गृहस्थ ब्राह्मण के मनोरंजन को अधिनियमित किया। इसलिए, चूँकि नित्यानंद ने पश्चिम बंगाल के यवनों के साथ जुड़ाव किया था, अद्वैत प्रभु ने उन पर उनके जुड़ाव से उनकी जाति और धार्मिक सिद्धांतों से भटकने का आरोप लगाया। वास्तव में नित्यानंद मदिरा पीने वाले तांत्रिक संन्यासी नहीं थे। इन घटनाओं से, धूर्त लोग भूल से नित्यानंद को स्वयं की तरह ही अनुशासनहीन मानते हैं। परन्तु नित्यानंद प्रभु ने कभी भी ऐसी पापी गतिविधियों को प्रोत्साहित करने वाली कोई शिक्षा नहीं दी है। इस संबंध में, पद्यवली से निम्नलिखित पद्य पर चर्चा करनी चाहिए:

परिवदतु जनो यथा तथा वा

ननु मुखरों न वयं विचारयामः

हरि-रस-मदिरा-मदात-मत्ता

भुवि विलुठामा नटामा निर्विशाम

"चर्चा करने वाले लोग जो कुछ भी कहें, कहें; हम उनकी परवाह नहीं करेंगे। कृष्ण के लिए प्रेम के नशीले पेय के आनंद से पूरी तरह से पागल होकर, हम जीवन का आनंद लेंगे, इधर-उधर भागेंगे, जमीन पर लोटेंगे और आनंद में नाचेंगे।"

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)