श्री चैतन्य भागवत  »  खण्ड 2: मध्य-खण्ड  »  अध्याय 19: अद्वैत आचार्य के घर में भगवान की लीलाएँ  »  श्लोक 210
 
 
श्लोक  2.19.210 
অনন্ত ব্রহ্মাণ্ডে যত, সব মোর দাস
এতেকে যে পর হিṁসে সেই যায নাশ
अनन्त ब्रह्माण्डे यत, सब मोर दास
एतेके ये पर हिꣳसे सेइ याय नाश
 
 
अनुवाद
“असंख्य ब्रह्माण्डों में सभी जीव मेरे सेवक हैं, इसलिए जो कोई किसी जीव की निन्दा करता है, वह नष्ट हो जाता है।
 
“All living entities in countless universes are my servants, so anyone who slanders any living entity is destroyed.
तात्पर्य
हरी के प्रति अरुचि होने के कारण, भौतिकवादी लोग काम और क्रोध के नेतृत्व में छह शत्रुओं की सेवा को ही अपनी एकमात्र शरण के रूप में स्वीकार करते हैं। दृश्य और अदृश्य दुनिया की सभी जीवित संस्थाएं परम प्रभु के सेवकों के रूप में स्थापित हैं। यदि कोई व्यक्ति दूसरे व्यक्ति से ईर्ष्या करता है, तो वह ईर्ष्यालु व्यक्ति इस बात की पुष्टि करता है कि वह खुद को वैष्णव के रूप में पुष्टि करने के बजाय उन लोगों के प्रति दुर्भावनापूर्ण है जो भगवान की सेवा के लिए इच्छुक हैं। इस तरह के विचारों में प्रदर्शित की गई ईर्ष्या कमोबेश सर्वोच्च प्रभु की ही ईर्ष्या है। इसके अलावा, चूंकि भक्तों की सेवा या कल्याणकारी कार्यों को करने की प्रवृत्ति बहुत मजबूत होती है, इसलिए जो लोग ईर्ष्यालु होते हैं वे श्री चैतन्य के ऐसे सेवकों के प्रयासों पर विचार करते हैं जो अज्ञानी लोगों के कृष्ण के प्रति झुकाव को बढ़ाने के लिए अपनी ही विभिन्न प्रकार की ईर्ष्यापूर्ण लीलाओं के समान हैं; यह उनके अशुभ होने की गारंटी देता है। लोग भोग की अपनी प्रवृत्ति के कारण उन वस्तुओं से ईर्ष्या करते हैं जो परम सत्य से संबंधित नहीं हैं। शुद्ध भक्त प्रकृति के तीनों गुणों द्वारा सद्भावना, जोश और अज्ञानता के पानी में विलीन होने के लिए कभी प्रेरित नहीं होते हैं। इसलिए गैर-ईर्ष्यालु भक्तों का आश्रय लिए बिना, ईर्ष्यालु भौतिकवादी अस्थायी भौतिक दुनिया के आनंद लेने वाले मायावाद जैसे दर्शन को स्वीकार करके अपने कर्म के परिणामस्वरूप असुविधा में पड़ जाते हैं और इस तरह खुद को बर्बाद कर लेते हैं। कोई भी अपने आप को असंवैधानिक प्रवृत्तियों से कभी भी महसूस नहीं कर सकता है। आकांक्षी मानव जाति के पास परम प्रभु की प्राप्ति के अलावा कोई विकल्प नहीं है। इसलिए, जो लोग आध्यात्मिक गुरु के प्रति शत्रुता रखते हैं वे आध्यात्मिक गुरु की शत्रुता, गर्व और अन्य बेकार वस्तुओं को धन के रूप में स्वीकार करते हैं; वे अज्ञान के अंधेरे में विलीन हो जाते हैं; और वे अवैयक्तिकता (केवलद्वैत-वाद) को महत्व देते हैं, जो स्वजातीय-विजातीय भेद, समान और भिन्न दोनों वस्तुओं के बीच भेद को नकारता है। यह उनका पतन है। सच्चिदानंद सर्वोच्च प्रभु की अमिश्रित सेवा आत्म-साक्षात्कार का अवसर है, अन्यथा व्यक्ति निश्चित रूप से गिर जाता है।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)