श्री चैतन्य भागवत  »  खण्ड 2: मध्य-खण्ड  »  अध्याय 19: अद्वैत आचार्य के घर में भगवान की लीलाएँ  »  श्लोक 172
 
 
श्लोक  2.19.172 
যদি তোরে না মানিযা মোরে ভক্তি করে
সেই মোর ভক্তি তবে তাহারে সṁহারে
यदि तोरे ना मानिया मोरे भक्ति करे
सेइ मोर भक्ति तबे ताहारे सꣳहारे
 
 
अनुवाद
“यदि कोई मेरी पूजा करता है, किन्तु आपको स्वीकार नहीं करता, तो उसकी मेरी भक्ति उसे नष्ट कर दे।
 
“If anyone worships me but does not accept you, let his devotion to me destroy him.
तात्पर्य
अद्वैत ने कहा, "हे भगवान विश्वम्भर, मेरे वंशजों की और तथाकथित शिष्यों की भक्ति का नाश हो जो तुम्हारी सेवा छोड़कर लालायित होकर मेरी सेवा में तल्लीन हैं। यह मेरी घोषणा है।" क्योंकि अद्वैत के अज्ञानी वंशज और मूर्ख शिष्य श्री अद्वैत प्रभु को श्री चैतन्यदेव का शाश्वत सेवक नहीं मानते हैं बल्कि उन्हें "विष्णु" मानते हैं और गौरसुंदर को "लक्ष्मी" मानते हैं, वे भक्ति सेवा के मार्ग से गिर जाते हैं और अपनी बर्बादी का कारण बनते हैं।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)