श्री चैतन्य भागवत  »  खण्ड 2: मध्य-खण्ड  »  अध्याय 19: अद्वैत आचार्य के घर में भगवान की लीलाएँ  »  श्लोक 129
 
 
श्लोक  2.19.129 
অদ্বৈত-গৃহিণী মনে মনে নমস্করে
দেখিযা প্রভুর মূর্তি চিন্তিত অন্তরে
अद्वैत-गृहिणी मने मने नमस्करे
देखिया प्रभुर मूर्ति चिन्तित अन्तरे
 
 
अनुवाद
अद्वैत की पत्नियों ने मन ही मन भगवान को प्रणाम किया। भगवान की यह मनोदशा देखकर वे व्याकुल हो उठीं।
 
Advaita's wives silently offered their respects to the Lord. Seeing the Lord's state of mind, they became distraught.
तात्पर्य
साँसारिक शिष्टाचार के अनुसार, अद्वैत की दो पत्नियों ने बाहरी तौर पर महाप्रभु को प्रणाम नहीं किया, लेकिन उनसे अपनी ग़लत अहंकार को त्याग कर आंतरिक रूप से अधीनता स्वीकार की।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)