श्री चैतन्य भागवत  »  खण्ड 2: मध्य-खण्ड  »  अध्याय 19: अद्वैत आचार्य के घर में भगवान की लीलाएँ  »  श्लोक 127
 
 
श्लोक  2.19.127 
ক্রোধ-মুখ বিশ্বম্ভর নিত্যানন্দ-সঙ্গে
দেখযে, অদ্বৈত দোলে জ্ঞানানন্দ-রঙ্গে
क्रोध-मुख विश्वम्भर नित्यानन्द-सङ्गे
देखये, अद्वैत दोले ज्ञानानन्द-रङ्गे
 
 
अनुवाद
नित्यानंद के साथ क्रोधित विश्वम्भर ने अद्वैत को ज्ञान की खुशी में आगे-पीछे डोलते देखा।
 
Visvambhara, enraged with Nityananda, saw Advaita swaying back and forth in the joy of knowledge.
तात्पर्य
श्री आदवैत प्रभु श्री गौरसुंदर से प्रचुर दया के रूप में दंड प्राप्त करने के इच्छुक थे, इसलिए उन्होंने मायावाद के सम्मान में आगे-पीछे हिलाया, जो भक्ति सेवा के विपरीत है। इसलिए, नित्यानंद के साथ वहां पहुंचने पर, महाप्रभु ने भक्ति सेवा से ईर्ष्या करने वालों के प्रति क्रोध दिखाया।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)