श्री चैतन्य भागवत  »  खण्ड 2: मध्य-खण्ड  »  अध्याय 19: अद्वैत आचार्य के घर में भगवान की लीलाएँ  »  श्लोक 111
 
 
श्लोक  2.19.111 
ভক্তি-হীন হৈলে এ-মত বুদ্ধি হয
নিন্দকের পূজাশিব কভু নাহি লয
भक्ति-हीन हैले ए-मत बुद्धि हय
निन्दकेर पूजाशिव कभु नाहि लय
 
 
अनुवाद
यदि कोई भक्ति से रहित है, तो इस प्रकार की मानसिकता विकसित हो जाती है। भगवान शिव कभी भी निन्दक की पूजा स्वीकार नहीं करते।
 
If one is devoid of devotion, this type of mentality develops. Lord Shiva never accepts the worship of a slanderer.
तात्पर्य
चूँकि जीव जो भक्ति सेवा के लिए जागृत नहीं हुए हैं, जो आत्मा की शाश्वत प्रवृत्ति है, शिव पूजा जैसी अनुष्ठानिक गतिविधियों के प्रदर्शन से जुड़े हुए हैं, वे श्री चैतन्यदेव द्वारा प्रचारित भक्ति सेवा की मधुरता को नहीं समझ सकते। काशी के स्वामी सदाशिव, कभी भी उन लोगों की पूजा स्वीकार नहीं करते जो वैष्णवों की निंदा करते हैं।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)