श्री चैतन्य भागवत  »  खण्ड 2: मध्य-खण्ड  »  अध्याय 19: अद्वैत आचार्य के घर में भगवान की लीलाएँ  »  श्लोक 105
 
 
श्लोक  2.19.105 
রামচন্দ্র-পুরীর মঠেতে লুকাই
যারহিলেন দুই মাস বারাণসী গিযা
रामचन्द्र-पुरीर मठेते लुकाइ
यारहिलेन दुइ मास वाराणसी गिया
 
 
अनुवाद
वाराणसी में रहते हुए वे रामचन्द्रपुरी के आश्रम में छिपे रहे, जहाँ वे दो महीने तक रहे।
 
While in Varanasi, he hid in the ashram of Ramchandrapuri, where he stayed for two months.
तात्पर्य
श्री गौरसुंदर वाराणसी में चंद्रशेखर के घर पर रहे। पेशे से शूद्र चंद्रशेखर एक डॉक्टर थे। श्री चैतन्य-भागवत के लेखक ठाकुर वृंदावन ने समझा कि श्री चैतन्य महाप्रभु गुप्त रूप से रामचंद्र पुरी के आश्रम में रहे। रामचंद्र पुरी माधवेंद्र पुरी के एक छद्म-शिष्य थे। उनके मन में मायावाद के दर्शन के प्रति बहुत झुकाव था। प्रभु ने खुले तौर पर घोषणा की कि वह रामचंद्र पुरी के आश्रम में रहे, जबकि वास्तव में वह कृष्ण के भक्तों की संगति में कहीं और रहे। रामचंद्र पुरी एक संप्रदायवादी सन्यासी थे, इसलिए आम जनता एक सन्यासी के रूप में प्रभु की आलोचना नहीं कर सकती थी कि वह उनके आश्रम में रह रहे हैं।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)