श्री चैतन्य भागवत  »  खण्ड 2: मध्य-खण्ड  »  अध्याय 18: महाप्रभु के गोपी के रूप में नृत्य  »  श्लोक 99
 
 
श्लोक  2.18.99 
হেন রঙ্গ হয চন্দ্রশেখর-মন্দিরে
চতুর্-দিকে হরি-ধ্বনি শুনি উচ্চৈঃস্বরে
हेन रङ्ग हय चन्द्रशेखर-मन्दिरे
चतुर्-दिके हरि-ध्वनि शुनि उच्चैःस्वरे
 
 
अनुवाद
चन्द्रशेखर के घर में ऐसी ही आनंदमय लीलाएँ घटित हुईं। हरि के नामों का उच्च स्वर चारों दिशाओं में गूंज उठा।
 
Similar blissful pastimes took place in Chandrashekhar's home. Loud chants of Hari's name resounded in all directions.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)