श्री चैतन्य भागवत  »  खण्ड 2: मध्य-खण्ड  »  अध्याय 18: महाप्रभु के गोपी के रूप में नृत्य  »  श्लोक 82-84
 
 
श्लोक  2.18.82-84 
এতেকে বরিল তোর চরণ-যুগল
মনঃ, প্রাণ, বুদ্ধি—তোঙ্হে অর্পিল সকল
পত্নী-পদ দিযা মোরে কর নিজ দাসী
মোর ভাগে শিশুপাল নহুক বিলাসী
কৃপা করিঽ মোরে পরিগ্রহ কর নাথ
যেন সিṁহ-ভাগ নহে শৃগালের সাথ
एतेके वरिल तोर चरण-युगल
मनः, प्राण, बुद्धि—तोङ्हे अर्पिल सकल
पत्नी-पद दिया मोरे कर निज दासी
मोर भागे शिशुपाल नहुक विलासी
कृपा करिऽ मोरे परिग्रह कर नाथ
येन सिꣳह-भाग नहे शृगालेर साथ
 
 
अनुवाद
"इसीलिए मैंने आपके चरणकमलों को अपना प्राण और आत्मा मान लिया है। मैंने अपना मन, प्राण और बुद्धि आपको अर्पित कर दी है। कृपया मुझे अपनी पत्नी के रूप में स्वीकार करके अपनी दासी बना लीजिए। मुझे शिशुपाल के भोग की वस्तु न बनने दीजिए। हे प्रभु, कृपया मुझे स्वीकार कीजिए, क्योंकि जो सिंह के लिए है, उसे सियार को नहीं लेना चाहिए।"
 
"That is why I have accepted your lotus feet as my life and soul. I have offered you my mind, soul, and intellect. Please accept me as your wife and make me your slave. Do not let me become an object of Shishupal's enjoyment. O Lord, please accept me, for what is meant for the lion should not be taken by a jackal."
तात्पर्य
श्रीमद् भागवतम (10.52.39) में कहा गया है:

तन मे भवान् खलु वृतः पतिरंगा जायाम्

आत्मार्पितश् च भवतोऽत्र विभो विधेहि

मा वीर-भागमभिमर्शन कैद्य आरद्

गोमायु-वन मृग-पतेर्बलिमम्बुजाक्ष

"इसलिए, हे मेरे प्रिय भगवान, मैंने आपको अपने पति के रूप में चुना है, और मैं आपको अपने आप को समर्पित करती हूँ। कृपया जल्दी से आओ, हे सर्वशक्तिमान, और मुझे अपनी पत्नी बनाओ। हे कमल-आंखों वाले भगवान, शिशुपाल को कभी भी नायक के हिस्से को उस गीदड़ की तरह ना छूने देना जो किसी शेर की संपत्ति चुराता है।"

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)