श्री चैतन्य भागवत  »  खण्ड 2: मध्य-खण्ड  »  अध्याय 18: महाप्रभु के गोपी के रूप में नृत्य  »  श्लोक 70
 
 
श्लोक  2.18.70 
গৃহান্তরে বেশ করে প্রভু বিশ্বম্ভর
রুক্মিণীর ভাবে মগ্ন হৈলা নির্ভর
गृहान्तरे वेश करे प्रभु विश्वम्भर
रुक्मिणीर भावे मग्न हैला निर्भर
 
 
अनुवाद
जैसे ही भगवान विश्वम्भर ने एक कमरे के अन्दर अपना वस्त्र पहना, वे पूरी तरह से रुक्मिणी की भाव-भंगिमा में लीन हो गये।
 
As soon as Lord Vishvambhara wore his clothes inside a room, he became completely absorbed in the expressions of Rukmini.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)