श्री चैतन्य भागवत  »  खण्ड 2: मध्य-खण्ड  »  अध्याय 18: महाप्रभु के गोपी के रूप में नृत्य  »  श्लोक 230
 
 
श्लोक  2.18.230 
শুনিযা বৈষ্ণব-গণ মনে মনে হাসে
কেহ আর কিছু নাহি করযে প্রকাশে
शुनिया वैष्णव-गण मने मने हासे
केह आर किछु नाहि करये प्रकाशे
 
 
अनुवाद
यह सुनकर वैष्णवों के हृदय में हर्ष उत्पन्न हुआ, किन्तु उन्होंने कोई स्पष्टीकरण नहीं दिया।
 
Hearing this, the Vaishnavas felt happy in their hearts, but they did not give any explanation.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)