श्री चैतन्य भागवत  »  खण्ड 2: मध्य-खण्ड  »  अध्याय 18: महाप्रभु के गोपी के रूप में नृत्य  »  श्लोक 216
 
 
श्लोक  2.18.216 
অদ্ভুত গোপিকা-নৃত্য চারি-বেদ-ধন
কৃষ্ণ-ভক্তি হয ইহা করিলে শ্রবণ
अद्भुत गोपिका-नृत्य चारि-वेद-धन
कृष्ण-भक्ति हय इहा करिले श्रवण
 
 
अनुवाद
भगवान के गोपी रूपी अद्भुत नृत्य के विषय में सुनकर, जो चारों वेदों का खजाना है, मनुष्य कृष्ण की भक्ति प्राप्त करता है।
 
By hearing about the wonderful dance of the Lord in the form of Gopis, which is the treasure of the four Vedas, one attains devotion to Krishna.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)