श्री चैतन्य भागवत  »  खण्ड 2: मध्य-खण्ड  »  अध्याय 18: महाप्रभु के गोपी के रूप में नृत्य  »  श्लोक 204
 
 
श्लोक  2.18.204 
কমলা, পার্বতী, দযা, মহা-নারায
ণীআপনে হৈলা প্রভু জগত-জননী
कमला, पार्वती, दया, महा-नाराय
णीआपने हैला प्रभु जगत-जननी
 
 
अनुवाद
भगवान स्वयं कमला, पार्वती, दया और महानारायणी के रूप में ब्रह्मांड की माता के रूप में प्रकट होते हैं।
 
The Lord Himself appears as Kamala, Parvati, Daya and Mahanarayani, the Mother of the Universe.
तात्पर्य
ईश्वर का परम व्यक्तित्व पूजा का उद्देश्य है। वह सभी का पालनहार है। जब उनकी ऊर्जा उनकी सेवा की ओर झुक जाती है और उनके विविध मनोरंजन प्रदर्शित करती है, तो वह जीवों की संवैधानिक स्थिति को पुनर्जीवित करने में मदद करती है। और जब वह जीवों को विचलित करने के लिए अपनी आवरण और फेंकने की शक्तियों को निर्देशित करती है, और वातानुकूलित जीव इसे सम्मान के साथ स्वीकार करते हैं, तो वह जीवों के भौतिक आनंद और अस्थायी लाभ का प्रदाता बन जाती है। यद्यपि श्री चंद्रशेखर के घर में माँ के रूप में भगवान के मनोरंजन की अभिव्यक्ति इस तर्क का खंडन करती है कि ये मनोरंजन सदैव अस्तित्व में रहने के लिए अनुपयुक्त हैं, प्रभु ने इस तरह के रूप को पूजा करने योग्य सर्वोच्च भगवान का निजी रूप नहीं होने का प्रदर्शन करने के लिए एक भक्त की मनोदशा को स्वीकार किया। ऐसा नहीं है कि केवल इसलिए कि श्री गौरसुंदर ने अपनी विभिन्न ऊर्जाओं के मनोरंजन को लागू करने का आदर्श उदाहरण प्रदर्शित किया कि वह अधीनस्थ, वातानुकूलित आत्मा के आनंद के पात्र हैं। इस दुनिया में एक माँ के आदर्श उदाहरण में देखा जाता है कि जब उसका बच्चा उससे सेवा स्वीकार करता है, तो बच्चा अपनी अविकसित चेतना के कारण ठीक से बदला नहीं ले पाता है। जब माँ अपने बच्चे को नौकरानी की तरह सेवा देती है, तो उसका बच्चा उस समय उसकी सेवा करने में पूरी तरह असमर्थ होता है। उस बिंदु पर बच्चे के लिए अपनी माँ की सेवा करने की कोई संभावना नहीं है, सिवाय उसकी सेवा को स्वीकार करने के। जब बच्चे की चेतना विकसित होती है, तो वह स्वामी बनने की तीव्र इच्छा भी विकसित कर लेता है। तब भी बच्चा यह नहीं समझ सकता कि उसकी माँ उसके जन्म से ही उसकी सेवा कर रही है और उसे उसकी सेवा करके अपना ऋण चुकाना चाहिए। जब बच्चे में ऐसी मानसिकता जागती है, तो वह भौतिक अस्तित्व का आनंद लेने की प्रवृत्ति नहीं दिखाता है। फिर भी विष्णु की मायावी ऊर्जा इतनी शक्तिशाली है कि वह यह योग्यता सभी को नहीं देती। भगवान कभी भी नौकर या नौकरानी नहीं बन सकते। वह हमेशा स्वामी और भोक्ता हैं। उनकी अधीनस्थ ऊर्जाएँ उनके सेवक और नौकरानियाँ हैं। जो लोग सर्वोच्च भगवान को नौकर या नौकरानी में बदलना चाहते हैं वे विष्णु की मायावी ऊर्जा से विचलित हैं। प्रभु विष्णु का आनंद कभी भी वातानुकूलित जीवों द्वारा नहीं लिया जाना चाहिए। इसलिए, भगवान की बाहरी ऊर्जा के परिवर्तन, भौतिक दुनिया को आनंद का निवास मानकर, जीव जो सीमांत ऊर्जा के परिवर्तन हैं, भौतिक दुनिया के स्वामी बन गए हैं, और शाक्त दर्शन की स्थापना करते हुए उन्होंने आध्यात्मिक जीवन के मार्ग से विदा ली है। जब वातानुकूलित आत्माओं को लगता है कि भौतिक आनंद उनके जीवन का लक्ष्य है, तो वे अपनी इंद्रिय तृप्ति के आपूर्तिकर्ता के रूप में सर्वोच्च भगवान को नियुक्त करते हैं। नतीजतन, वे भौतिक आनंद की रस्सियों में उलझ जाते हैं। गौरासुंदर के एक भक्त की मनोदशा को स्वीकार करने के मनोरंजन में, ब्रह्मांड की माँ के रूप में उनके मनोरंजन का प्रदर्शन यह प्रदर्शित करना है कि ऊर्जावान विष्णु की सेवा ही आदि-शक्ति की एकमात्र प्रवृत्ति है, जो शाक्त दर्शन के अनुयायियों की पूजा करने योग्य देवी है। विष्णु को कभी भी ऊर्जा नहीं माना जाना चाहिए; ऊर्जा हमेशा सर्वोच्च भगवान के आश्रय में रहती है। गौरसुंदर ने इस तरह के मनोरंजन को यह पुष्टि करने के लिए प्रकट किया कि भगवान की सेवा की ओर प्रवृत्त ऊर्जाएँ ऊर्जावान के लिए सबसे अनुकूल हैं और ऊर्जाओं को हेरफेर करने के बाहरी भ्रामक ऊर्जा के प्रदर्शन आंतरिक ऊर्जा के जोड़तोड़ के साथ असंगत हैं।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)