श्री चैतन्य भागवत  »  खण्ड 2: मध्य-खण्ड  »  अध्याय 18: महाप्रभु के गोपी के रूप में नृत्य  »  श्लोक 170
 
 
श्लोक  2.18.170 
জগত্-স্বরূপা তুমি, তুমি সর্ব-শক্তি
তুমি শ্রদ্ধা, দযা, লজ্জা, তুমি বিষ্ণু-ভক্তি
जगत्-स्वरूपा तुमि, तुमि सर्व-शक्ति
तुमि श्रद्धा, दया, लज्जा, तुमि विष्णु-भक्ति
 
 
अनुवाद
"आप ब्रह्मांड के स्वरूप हैं और आपमें समस्त शक्तियाँ विद्यमान हैं। आप श्रद्धा, करुणा और लज्जा हैं और आप भगवान विष्णु की भक्ति के साक्षात स्वरूप हैं।
 
“You are the embodiment of the universe and all powers reside within you. You are faith, compassion and modesty, and you are the very embodiment of devotion to Lord Vishnu.
तात्पर्य
श्री भगवत-संदर्भ (117) में यह लिखा है: "प्रभु की सेवा उनकी प्रमुख अंत:शक्तियों- श्री, पुष्टि, गीर, कांति, कीर्ति, तुष्टि, इला और ऊर्जा के द्वारा भी की जाती थी। उनकी भौतिक शक्तियां विद्या, अविद्या और माया हैं और उनकी आंतरिक सुख शक्ति शक्ति है।' (भाग 10.39.55)। शक्ति शब्द लक्ष्मी रूपी आंतरिक शक्ति अथवा ऊर्जा को संदर्भित करता है। जब शक्ति शब्द का उल्लेख किया जाता है, तो यह प्रथम आंतरिक ऊर्जा, अथवा महा शक्ति को संदर्भित करता है और माया आंतरिक ऊर्जा है। लेकिन ऊर्जाओं की अध्यक्षता कर रहीं शक्तियों की दो प्रवृत्तियां हैं क्योंकि सभी ऊर्जाएं दो प्रकार की होती हैं- भौतिक और आध्यात्मिक। यह समझा जाना चाहिए कि श्री सहित वाली ऊर्जाएं पत्नियों के रूप में और माया के रूप में दोनों प्रकार से कार्य करती हैं। उनमें से, पूर्व श्रेणी की श्री सर्वोच्च प्रभु की संपन्नता है, लेकिन वह महा लक्ष्मी का रूप नहीं है क्योंकि श्री मूल शक्ति अथवा मूल ऊर्जा है। इसे बाद में समझाया जाएगा। बाद वाली श्रेणी, भौतिक जगत की संपन्नता है। उसके विषय में, सर्वोच्च प्रभु ने कहा है (भाग 3.16.7): "ना श्री विरक्तम अपि माम विजहाति-" "भाग्य की देवी [श्री] मुझको नहीं छोड़ती है, भले ही मुझको उसके लिए कोई लगाव नहीं है।' इस प्रकार से श्री नारद ने चतुर्थ कैंटो (4.31.22) के अंत में भी कहा है [श्रिया अनुचरतीं तदर्थिनः च द्विपद-पतीन् विभुधान् च यत स्व-पूर्णः- न भजति निज-भृत्य-वर्ग-तंत्रः कथाम अमुम उद्विसृजेत पुमान कृत-ज्ञः] "हालाँकि परमेश्वर स्वयं संपन्न है, वह अपने भक्तों पर निर्भर रहता है। वह भाग्य की देवी [श्री] को पसंद नहीं करता, न ही उन राजाओं और देवताओं को जो भाग्य की देवी के पक्षधर हैं। वह व्यक्ति कहां है जो वास्तव में आज्ञाकारी है और परमेश्वर की पूजा नहीं करेगा?" ऊपर दी गई शक्तियों में से, इला अथवा भू-शक्ति में लीला-शक्ति के समान विशेषताएं हैं। दोनों में, पहली, अथवा इला, भू-शक्ति का अभिव्यक्ति है और सत्य को साक्षात करने का कारण है। वह सांविता शक्ति का एक विशेष पहलू है। बाद वाली, अथवा लीला-शक्ति, ज्ञान का प्रवेश द्वार है। वह मातृ प्रेम पर आधारित अत्यधिक प्रेम का पहलू है जो प्रभु की संपन्नता को भूलने में मदद करता है। इसीलिए गोपाल तापनी उपनिषद ने इस ऊर्जा को व्रज के ग्वालों के लिए भ्रामक के रूप में वर्णित किया है। लीला-शक्ति का अन्य [भौतिक] पहलू वह आच्छादित शक्ति है जो बाध्य आत्माओं को उनकी अपनी अस्मिता भूलने का कारण बनती है। यह श्लोक से शुरू होकर ca शब्द के प्रयोग से समझा जाना चाहिए कि भू-शक्ति की ऊर्जाएं जैसे कि सांधिनी, संविता, ह्लादिनी, भक्ति, मूर्ति, विमला, जय, योगा, प्रह्वी, ईशान और अनुग्रहा- शामिल हैं। इन्हें सांधिनी, सत्य, जय, योगा, योगमाया, संविता, ज्ञानाज्ञान और शुद्ध सत्व के रूप में भी जाना जाता है। प्रह्वी विभिन्न आनंद और योग्यता का कारण है। ईशान पूर्ण नियंत्रण की ऊर्जा का कारण है। यही अंतर है। उसी प्रकार से, उत्तर (लीला) ऊर्जा में कई विभिन्न प्रकार की प्रवृत्तियां हैं। माया की प्रवृत्तियों का यहाँ वर्णन नहीं किया गया है क्योंकि वे बाहरी ऊर्जा की सेवा करती हैं। लेकिन मूल पाठ में उन प्रवृत्तियों को सामान्यतः सेवा के अंग के रूप में गिना गया है। माया की बाहरी स्थिति सर्वोच्च प्रभु के ऐकिक भाग के आश्रय में दूरी में रहने के कारण है। अन्यथा, मूल पद ( भाग 10.39.55) में शब्द शक्ति का उपयोग संज्ञा के रूप में किया गया है। ऊर्जा श्री मूल रूप है और पुष्टि जैसी ऊर्जाएं इसके अंग हैं। विद्या का अर्थ ज्ञान है, अज्ञानता नहीं। इस ज्ञान का वर्णन भगवद गीता (9.2) में निम्नानुसार किया गया है:

राज-विद्या राज-गुह्यम् पवित्रम् इदम उत्तमम्

प्रत्यक्षागमम् धर्म्यम् सु-सुखम् कर्तुम अव्ययम

यह ज्ञान शिक्षा का राजा है, सभी गुप्त ज्ञान का सबसे गुप्त ज्ञान है। यह सबसे शुद्ध ज्ञान है, और क्योंकि यह आत्म-साक्षात्कार द्वारा स्वयं की प्रत्यक्ष अनुभूति देता है, यह धर्म की पूर्णता है। यह चिरस्थायी है, और इसे आनंदपूर्वक निष्पादित किया जाता है।' पाठ में शब्द माया बाहरी ऊर्जा को संदर्भित करता है। श्री जैसे उसके पहलू उससे अलग हैं। अन्य वही हैं। यद्यपि इन सभी ऊर्जाओं को प्रभु की आंतरिक या आध्यात्मिक ऊर्जा के पहलुओं में गिना जाता है, यह निष्कर्ष निकाला जाना चाहिए कि चूंकि परम सत्य सत्-चित-आनंद है, ऊर्जा एक है फिर भी तीन में विभाजित है।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)