श्री चैतन्य भागवत  »  खण्ड 2: मध्य-खण्ड  »  अध्याय 18: महाप्रभु के गोपी के रूप में नृत्य  »  श्लोक 166
 
 
श्लोक  2.18.166 
কেহ পডে লক্ষ্মী-স্তব, কেহ চণ্ডী-স্তুতি
সবে স্তুতি পডে যাহার যেন মতি
केह पडे लक्ष्मी-स्तव, केह चण्डी-स्तुति
सबे स्तुति पडे याहार येन मति
 
 
अनुवाद
कुछ ने लक्ष्मी की स्तुति की, कुछ ने दुर्गा की स्तुति की। सभी ने अपनी-अपनी अनुभूति के अनुसार स्तुति की।
 
Some praised Lakshmi, some praised Durga, and each one offered praise according to their own feelings.
तात्पर्य
एक शक्ति, या पत्नी, की वेशभूषा में श्री गौरसुंदर को देखकर, जो व्यक्ति अच्छाई के मिथ्या अहंकार में स्थित थे, उन्होंने उनसे नारायणी-महालक्ष्मी के रूप में प्रार्थना करना शुरू कर दिया। अन्य जो अज्ञान के मिथ्या अहंकार में स्थित थे, उन्होंने उन्हें चंडीका-स्तोत्र के रूप में जानी जाने वाली प्रार्थनाएँ अर्पित कीं।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)