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श्लोक 2.18.132  |
অচিন্ত্য অব্যক্ত কিবা মহাযোগেশ্বরী
ভক্তির স্বরূপা হৈলা আপনি শ্রী-হরি |
अचिन्त्य अव्यक्त किबा महायोगेश्वरी
भक्तिर स्वरूपा हैला आपनि श्री-हरि |
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| अनुवाद |
| क्या भगवान हरि स्वयं समस्त रहस्यपूर्ण सिद्धियों की अकल्पनीय दिव्य देवी तथा भक्ति सेवा के साक्षात स्वरूप बन गए हैं? |
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| Has Lord Hari himself become the unimaginable divine goddess of all mystical accomplishments and the very embodiment of devotional service? |
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