श्री चैतन्य भागवत  »  खण्ड 2: मध्य-खण्ड  »  अध्याय 18: महाप्रभु के गोपी के रूप में नृत्य  »  श्लोक 114
 
 
श्लोक  2.18.114 
প্রেম-নদী বহে গদাধরের নযনে
পৃথিবী হৈলা সিক্ত, ধন্য করিঽ মানে
प्रेम-नदी वहे गदाधरेर नयने
पृथिवी हैला सिक्त, धन्य करिऽ माने
 
 
अनुवाद
गदाधर के नेत्रों से नदी के समान बहते प्रेमाश्रुओं से भीगी हुई पृथ्वी अपने को सौभाग्यशाली समझ रही थी।
 
The earth, drenched with tears of love flowing like a river from the eyes of Gadhdhar, was considering itself fortunate.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)